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महाशिवरात्रि स्पेशल: हर्ष में थी विश्व की एकमात्र लिंगोद्भव मूर्ति, आज भी मौजूद है दुर्लभतम पंचमुखी शिव

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सीकर. हर्ष पर्वत पर लोग अक्सर जाते हैं। पर्यटन के लुत्फ के साथ मंदिरों में शीश भी नवाते हैं। लेकिन, शायद ही किसी को मालूम हो कि इस पहाड़ी का नाम हर्ष व यहां के शिव मंदिर का नाम हर्षनाथ क्यों पड़ा। यहां दो शिव मंदिर का निर्माण क्यों हुआ तथा कैसे यह मंदिर मुगल बादशाह औरंगजेब के निशाने पर आया। मंदिर का पौराणिक व ऐतिहासिक महत्व,भगवान शिव के दुर्लभतम पंचमुखी व विश्व के एकमात्र लिंगोद्भव की मूर्ति की जानकारी भी बहुत कम लोगों को होगी। ऐसे में महाशिवरात्रि के अवसर पर आज पत्रिका पहली बार हर्ष के इन महादेव मंदिरों का पूरा रहस्य उजागर कर रहा है। जो पूजा- पाठ, पुराण व पुरातत्व तीनों लिहाज से काफी महत्वपूर्ण है।
हर्ष नामकरण: राक्षस के अंत पर देवताओं ने हर्ष से की थी शिव स्तुतिहर्ष पहाड़ी व भगवान शिव के हर्षनाथ नामकरण के पीछे पौराणिक कथा जुड़ी है। शिवपुराण में जिक्र है कि त्रिपुर राक्षस ने इंद्र व अन्य देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था। शिलालेख के अनुसार तब देवताओं ने इसी पहाड़ी पर शरण ली थी। इसके बाद जब भगवान शिव ने त्रिपुर राक्षस का अंत किया तो प्रसन्न हुए देवताओं ने इसी पहाड़ी पर भगवान शिव की स्तुति की थी। चूंकि देवताओं ने बहुत हर्ष के साथ यह स्तुति की थी। ऐसे में इस पहाड़ी का नाम हर्ष व यहां स्थापित शिव हर्षनाथ कहलाए।
रानोली के ब्राह्मण के आग्रह पर 1048 साल पहले बना मंदिरप्रागैतिहासिक काल का शिव मंदिर संवत एक हजार में अजमेर सांभर के चौहान वंश के शासक सिंहराज के क्षेत्राधिकार में था। जय हर्षनाथ- जय जीण भवानी पुस्तक के लेखक महावीर पुरोहित लिखते हैं कि इस काल में रानोली का नाम रणपल्लिका था। यहां के एक ब्राह्मण सुहास्तु रोजाना पैदल चलकर इस पर्वत पर शिव आराधना किया करते थे। इन्हीं सुहास्तु के कहने पर राजा सिंहराज से हर्ष पर हर्षनाथ मंदिर निर्माण व वहां तक पहुंचने के लिए सुगम रास्ते की मांग की। इस पर महाराज सिंहराज ने विक्रम संवत 1018 में हर्षनाथ मंदिर की नींव रखी और पहाड़ की गोद में एक नगर बसाया। जिसका नाम हर्षा नगरी रखा गया। यही आज हर्ष गांव कहलाता है। इतिहासकार डा. सत्यप्रकाश ने इसे अनन्ता नगरी भी कहा। यहां सदा बहने वाली चंद्रभागा नदी भी थी। मंदिर का निर्माण सुहास्तु के सलाहकार सांदीपिता के मार्गदर्शन में वास्तुकार वाराभद्र ने वैज्ञानिक ढंग से किया था।
विश्व की एकमात्र लिंगोद्भव व पंचमुखी मूर्ति हर्ष मंदिर में लिंगोद्भव की मूर्ति भी प्रतिष्ठित की गई थी। जो विश्व की एकमात्र मूर्ति थी। जो अब अजमेर के संग्रहालय में स्थित है। वहीं, हर्ष पर भगवान शिव की पंचमुखी मूर्ति अब भी विराजित है। जो भी दुर्लभतम मानी जाती है। संभवतया यह प्रदेश की एकमात्र व सबसे प्राचीन शिव प्रतिमा है। पुराणों में जिक्र है कि भगवान विष्णु के मनोहारी किशोर रूप को देखने के लिए भगवान शिव का यह रूप सामने आया था।
इसलिए पंचाचन कहलाए शिवभगवान शिव के पांच मुंह पंचतत्व यानी जल, वायु, अग्नि, आकाश, पृथ्वी की उत्पत्ति व जगत कल्याण की कामना से विभिन्न कल्पों में हुए उनके सद्योजात, वामदेव, तत्पुरुष, अघोर और ईशान अवतार के प्रतीक माने जाते हैं। एक पौराणिक कथा के अनुसार भगवान विष्णु का मनोहारी किशोर रूप देखने के लिए भी भगवान शिव इस रूप में प्रकट हुए थे। पांच मुखों के कारण शिव ‘पंचाननÓ और ‘पंचवक्त्रÓ कहलाते हैं।
मंदिर के प्रकाश ने खींचा औरंगजेब का ध्यानइतिहासकारों का कहना है कि प्राचीन शिव मंदिर पर एक विशाल दीपक जलता था। जिसे जंजीरों व चरखी के जरिये ऊपर चढ़ाया जाता था। इस दीपक का प्रकाश सैंकड़ों किलोमीटर दूर से देखा जा सकता था। इसी प्रकाश को औरंगजेब ने देखा था। जिसने खंडेला अभियान के दौरान संवत 1739 में इस पर आक्रमण कर खंडित कर दिया था।
राव शिवसिंह ने बनवाया दूसरा मंदिरऔरंगजेब के आक्रमण के बाद संवत 1781 में हर्ष पर दूसरा शिव मंदिर बना। जिसे सीकर के शासक राव शिव सिंह ने महात्मा शिवपुरी के आदेश पर बनवाया था। कहा जाता है कि महात्मा शिवपुरी के आशिर्वाद से ही शिव सिंह का जन्म हुआ था।
देश- विदेश के म्यूजियम में हर्ष की मूर्तियांहर्ष की मूर्तियों का महत्व देश- विदेश के कई संग्रहालयों में इनके संगहण से भी समझा जा सकता है। सीकर के श्रीहरदयाल म्यूजियम के अलावा दिल्ली के राजपूताना संग्रहालय, अमेरिका के क्लीव लैण्ड ऑफ आर्ट तथा नेल्सन एटकिन्स गैलेरी तथा फिलेडोल्फिया म्यूजियम ऑफ आर्ट पेरिस के रोवर्ट रूसो के निजी संग्रह में में हर्ष की मूर्तियां है।लिंगोद्भव मूर्ति अजमेर के संग्रहालय में है। यहां के कसौटी पत्थर की मूर्ति विदेशी ले गए।
आज भी होता है अभिषेकपंचमुखी शिव की प्रतिमा की पूजा अर्चना अब भी लगातार जारी है। मंदिर के विजय पुजारी का कहना है कि जाट समाज में पूनियां गोत्र की धोक आज भी इसी मंदिर में लगती है। सावन व शिवरात्रि पर मूर्ति का अभिषेक भी किया जाता है।
 

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