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क्यों रफाल सौदे पर उठने वाले सवालों को सिर्फ विपक्ष की राजनीति बता देना सही नहीं है?

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हाल ही में पांच रफाल विमानों के भारत पहुंचने पर एक तरफ तो जश्न छाया रहा और दूसरी तरफ कुछ पुराने वे सवाल फिर उठ खड़े हुए जिनके जवाब ठीक से दिये नहीं गये हैं.
अक्टूबर 1953 में फ्रांस से चार लड़ाकू विमानों ने भारत के लिए उड़ान भरी थी. इन्हें बनाने वाली कंपनी ने इनका नाम ऊरागां रखा था जिसका हिंदी में अर्थ होता है तूफान. इन विमानों को भारतीय वायु सेना में शामिल होना था. एक पखवाड़े का सफर तय करते हुए चारों विमान भारत पहुंच गए. भारतीय वायु सेना ने इन्हें नाम दिया – तूफानी.
67 साल बाद बीते दिनों यह कहानी कमोबेश इसी तरह दोहराई गई जब फ्रांस से उड़ान भरते हुए पांच रफाल विमान भारत पहुंचे. रफाल को भी उसी फ्रांसीसी कंपनी दसॉ ने बनाया है जिसने तूफानी को बनाया था. भारतीय वायु सेना का हिस्सा बनने वाले ये विमान भी उन विमानों की तरह अंबाला बेस पर पहुंचे थे. तूफानी की तरह रफाल भी वायु सेना की दो टुकड़ियों (स्क्वैड्रन्स) का हिस्सा बनेंगे.
हालांकि 67 साल के अंतराल पर हुई इन दोनों घटनाओं में कुछ अंतर भी हैं. रफाल के भारत पहुंचने की खूब धूम रही. टीवी चैनलों से लेकर अखबारों और सोशल मीडिया तक हर जगह इसका खुमार देखा गया. करीब सात दशक पहले जब तूफानी अंबाला बेस में उतरे थे तो ऐसा कुछ नहीं हुआ था. बताया जाता है कि तब बेस पर महज दस-ग्यारह अधिकारियों ने ही इन विमानों का स्वागत किया था.
रफाल विमानों ने फ्रांस से भारत की अपनी यात्रा में सिर्फ एक विराम लिया, हालांकि वे इसके बिना भी यह सफर पूरा कर सकते थे. उधर, 1953 में आए विमानों की यात्रा एक पखवाड़े की थी और इस दौरान ये 11 जगहों पर रुके. विडंबना देखिए कि उनका आखिरी स्टॉप कराची था जहां 12 साल बाद यानी 1965 की लड़ाई में उन्होंने बम बरसाए. तूफानी विमानों ने गोवा की पुर्तगाली शासन से मुक्ति से लेकर मिजोरम में अलगाववाद को कुचलने तक कई मोर्चों पर शानदार प्रदर्शन किया. उधर, रफाल के बारे में कहा जा रहा है कि ये लड़ाकू विमान पाकिस्तान और चीन यानी दो तरफ से बढ़ रहे खतरे के बीच वायु सेना को नई ताकत देने जा रहे हैं.
ऐसा कहने की वजह वे हथियार हैं जो रफाल में लगने हैं और जो इस विमान की क्षमताओं को चीन और पाकिस्तान के पास मौजूद लड़ाकू विमानों से कुछ आगे ले जाते हैं. ये हथियार रफाल के आने से पहले ही भारत पहुंच चुके हैं. इनमें सबसे खतरनाक है हवा से हवा में मार करने वाली मिटिऑर मिसाइल. वैसे तो ऐसी मिसाइलें दूसरे विमानों में भी होती हैं लेकिन, मिटिऑर 120 किलोमीटर से भी ज्यादा दूर स्थित लक्ष्य को भेद सकती है.
लेकिन क्या ये खूबियां उस कीमत को न्यायसंगत साबित करती हैं जिसे चुकाकर रफाल को खरीदा गया है?
रफाल सौदे की कहानी 2006 से शुरू होती है जब भारत के रक्षा मंत्रालय ने लड़ाकू विमानों को खरीदने की प्रक्रिया की औपचारिक शुरुआत की. इसके बाद 2011 तक भारतीय वायु सेना ने विभिन्न कंपनियों के विमान का फील्ड ट्रायल किया. फील्ड ट्रायल के बाद दो कंपनियों दसॉ और यूरोफाइटर टाइफून नाम का विमान बनाने वाली यूरोपीय कंपनियों के एक कंसॉर्टियम को शाॅर्टलिस्ट किया गया. दोनों ने अपना प्रस्ताव भारत सरकार के पास रखा. इसके बाद जनवरी 2012 में खबर आई कि कम कीमत की पेशकश के चलते दसॉ ने बाजी मार ली है.
इस सौदे के तहत 126 विमान खरीदे जाने थे. इनमें से 18 को फ्लाइअवे यानी रेडीमेड हालत में दिया जाना था और 108 सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी हिंदुस्तान एयरोनाॅटिक्स लिमिटेड (एचएएल) द्वारा असेंबल किये जाने थे. मतलब कि 108 रफाल विमानों के पुर्जे दसॉ देती और उन्हें विमान की शक्ल देने का काम एचएएल करती. सौदे के तहत एचएएल को तकनीक का हस्तांतरण यानी टेक्नॉलाॅजी ट्रांसफर भी होना था.
मार्च 2015 तक इसी सौदे पर बात चल रही थी. लेकिन अगले ही महीने अपनी फ्रांस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अचानक ऐलान किया कि भारत सरकार दसॉ से 36 रफाल विमान खरीदने जा रही है. बाद में आधिकारिक सूत्रों के हवाले से खबरें आईं कि इस सौदे की कीमत आखिर में 60 हजार करोड़ रु तक जा सकती है. इस हिसाब से देखें तो एक रफाल विमान 1600 करोड़ रु से भी ज्यादा का पड़ रहा है.
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस आंकड़े को लेकर ही मोदी सरकार पर हमलावर रहा है. उसके मुताबिक उसकी अगुवाई वाली यूपीए सरकार ने यह सौदा 526 करोड़ रु प्रति विमान के हिसाब से तय किया था तो मोदी सरकार के समय यह रकम तिगुनी से भी ज्यादा क्यों हो गई है. बीते दिनों रफाल विमानों की पहली खेप भारत में आने के बाद कांग्रेस ने एक बार फिर मोदी सरकार पर निशाना साधा.
इस मौके पर वायु सेना को बधाई देते हुए पार्टी नेता राहुल गांधी का कहना था, ‘क्या भारत सरकार इसका जवाब दे सकती है: (1) क्यों हर विमान की कीमत 526 के बजाय 1670 करोड़ बैठ रही है? (2) 126 के बजाय 36 विमान क्यों खरीदे गए? (3) क्यों एचएएल के बजाय दिवालिया अनिल (अंबानी) को 30 हजार करोड़ का ठेका दिया गया?’ कांग्रेस काफी समय से यह आरोप लगा रही है कि रफाल की खरीद में घोटाला हुआ है.

Congratulations to IAF for Rafale.
Meanwhile, can GOI answer:
1) Why each aircraft costs ₹1670 Crores instead of ₹526 Crores?
2) Why 36 aircraft were bought instead of 126?
3) Why was bankrupt Anil given a ₹30,000 Crores contract instead of HAL?
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) July 29, 2020

रफाल सौदे का मामला लेकर सुप्रीम कोर्ट जा चुके पूर्व केंद्रीय मंत्रियों अरुण शौरी व यशवंत सिन्हा और वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने भी मोदी सरकार को कटघरे में खड़ा किया है. उनका भी दावा है कि इस सौदे में बोफोर्स से कहीं बड़ा घोटाला हुआ है. सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की जांच की मांग करने वाली एक याचिका दाखिल करके उन्होंने दावा किया था कि इस सौदे से देश को 36,000 करोड़ रु की चपत लगी है. हालांकि शीर्ष अदालत ने इस याचिका को खारिज कर दिया था.
कुछ मीडिया रिपोर्टों की भी मानें तो भारत ने रफाल के लिए दूसरे देशों से ज्यादा कीमत चुकाई है. ऐसी एक रिपोर्ट के मुताबिक कतर ने भी फ्रांस से 36 रफाल खरीदने के लिए समझौता किया था और उसने एक विमान के लिए करीब 108 मिलियन डॉलर चुकाए. 2015 में हुए इस समझौते के हिसाब से देखें तो कतर को हर रफाल करीब 700 करोड़ रु का पड़ा. उधर, केंद्र में सत्ताधारी भाजपा इस सौदे को लेकर लगने वाले सभी आरोपों को खारिज करती रही है. बल्कि उसका दावा है कि उसकी सरकार ने यूपीए सरकार के समझौते की तुलना में कम कीमत पर यह समझौता किया है.
दो साल पहले तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली का कहना था कि यूपीए सरकार के समय इस सौदे की जो कीमत थी, उसकी तुलना में एनडीए सरकार की ओर से तय कीमत 20 फीसदी कम है. इससे करीब दो महीने पहले ही तत्कालीन रक्षा राज्य मंत्री सुभाष भामरे ने एक सवाल के जवाब में राज्य सभा में कहा था कि एक विमान 670 करोड़ रु का पड़ा है. हालांकि उन्होंने इस सबंध में और कोई ब्योरा नहीं दिया जिससे कयास लगे कि सरकार ने खाली विमान की कीमत (बेस प्राइस) बताकर मामले से पल्ला झाड़ लिया है. वैसे भी सरकार रफाल सौदे की वास्तविक कीमत बताने के मामले में कभी हां, कभी ना वाले अंदाज में बर्ताव करती रही है.

उधर, सुप्रीम कोर्ट में खारिज हो चुकी अपनी याचिका में अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण का आरोप था कि रफाल के साथ मंगाए गए अतिरिक्त हथियारों की कीमत बढ़ा-चढ़ाकर दिखाई गई ताकि नरेंद्र मोदी अपने मित्र अनिल अंबानी को फायदा पहुंचा सकें. असल में सौदे के ऑफसेट प्रावधान के तहत दसॉ को उसे मिलने वाली कुल रकम का 50 फीसदी यानी करीब 30 हजार करोड़ रु भारत में निवेश करना था. इसके तहत उसे अपने लिए एक भारतीय साझीदार चुनकर एक ऐसा संयुक्त उपक्रम भी बनाना था जो रफाल विमानों के रखरखाव और मरम्मत का काम देख सके. कंपनी ने भारतीय साझीदार के रूप में अनिल अंबानी का चयन किया.
इस पर सवाल इसलिए उठे कि एक तो अनिल अंबानी को रक्षा क्षेत्र में उत्पादन का कोई अनुभव नहीं था और दूसरा, उस समय वे दिवालिया होने के कगार पर होने के साथ-साथ 2जी घोटाला मामले में सीबीआई जांच का सामना भी कर रहे थे. इसी दौरान सितंबर 2018 में फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने भी अपने इस बयान से हंगामा खड़ा कर दिया था कि भारत सरकार ने ही फ्रांस सरकार से इस सौदे के भारतीय साझेदार के रूप में अनिल अंबानी की कंपनी के नाम का प्रस्ताव देने को कहा था. इससे पहले मोदी सरकार ने कहा था कि यह दो कंपनियों के बीच की बात है जिसमें उसकी कोई भूमिका नहीं है.
किस्सा कुल यह कि दावों और आरोपों के जवाब में हर पक्ष के अपने-अपने दावे और प्रत्यारोप हैं. लेकिन मूल सवाल अपनी जगह पर है कि आखिर प्रति विमान भारत को कितना खर्च करना पड़ा. जैसा कि जिक्र हुआ, कांग्रेस का कहना है कि उसकी सरकार के समय यह कीमत 526 करोड़ रु तय हुई थी, लेकिन भाजपा ने भ्रष्टाचार कर इसे 1670 करोड़ कर दिया. उधर, भाजपा ने इस आंकड़े को 670 करोड़ रु बताया है.
क्या मोदी सरकार ने जरूरत से ज्यादा कीमत चुकाई? इस सवाल पर द क्विंट से ही बातचीत में दिल्ली स्थित चर्चित थिंक टैंक सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च से जुड़े भरत कर्नाड कहते हैं, यूपीए सरकार की योजना टोटल ट्रांसफर ऑफ टेक्नॉलॉजी यानी तकनीकी के पूर्ण हस्तांतरण की थी. कांग्रेस ने अपने वक्त में सौदेबाजी के बाद जो कीमत तय की थी वह उस रकम से करीब दो अरब डॉलर ज्यादा थी जो आज हम 36 विमानों के लिए दे रहे हैं, और वह सौदा 126 रफाल विमानों के लिए था.
यह सही है कि यह 2010 की बात है, लेकिन अगर आप समय के साथ महंगाई में बढ़ोतरी वाला पहलू भी देखें तो भी मुझे नहीं लगता कि इतने कम विमानों के लिए यह आंकड़ा इतना ज्यादा हो जाना चाहिए और वह भी तब जब टेक्नॉलॉजी ट्रांसफर नहीं हो रहा है.’ वे आगे कहते हैं, ‘तकनीक ही वह बुनियादी कारण था जिसके चलते रफाल को भारतीय वायुसेना के लिए एक बढ़िया खरीद बताया गया था. सरकार ने भी तब इसे इस सौदे का मुख्य आकर्षण बताया था.
कुछ अन्य विशेषज्ञ भी मानते हैं कि तकनीकी हस्तांतरण के प्रावधान को हटाकर नया सौदा ही करना था तो फिर और भी विकल्प हो सकते थे जो रफाल जितने ही प्रभावी लेकिन इससे काफी सस्ते होते. रक्षा मामलों को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार मनु पब्बी के मुताबिक जुलाई 2014 में यानी दसॉ के साथ 36 विमानों के नए सौदे से कुछ ही महीने पहले यूरोफाइटर टाइफून बनाने वाली यूरोपीय कंपनियों के कंसॉर्टियम ने तत्कालीन रक्षा अरुण जेटली को एक चिट्ठी लिखी थी.
यूपीए सरकार के समय शुरू हुई खरीद प्रक्रिया में अपनी कम बोली के साथ रफाल ने यूरोपीय टाइफून को ही पछाड़ा था. इस चिट्ठी में यह विमान 5.9 करोड़ यूरो यानी करीब 453 रु में देने की पेशकश की गई थी. इस पेशकश में तकनीक के पूर्ण हस्तांतरण की बात भी थी जिसके तहत भारत में यूरोफाइटर के उत्पादन और रखरखाव के लिए इकाइयां लगाई जातीं. लेकिन सरकार ने इस पर विचार नहीं किया.
उधर, कीमत के मुद्दे पर सरकार यह तर्क देती रही है कि ऑफसेट प्रावधान के तहत आधा पैसा तो वापस भारत में ही आना है. लेकिन विशेषज्ञ इस पर भी सवाल उठाते हैं. दिल्ली स्थित थिंक टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन से जुड़े और सेना के आधुनिकीकरण पर नजर रखने वाले पूषन दास कहते हैं, ‘जो सौदा हुआ है उसके तहत दसॉ को यह छूट है कि वह ऑफसेट प्रावधान के तहत लगने वाला पैसा भारत में जहां और जैसे चाहे लगाए. इसका ज्यादातर हिस्सा दसॉ के असैन्य कारोबारों पर लग रहा है. उदाहरण के लिए फाल्कन (छोटा विमान) और जेट विमानों पर. तो क्या इस प्रावधान से भारत की सैन्य क्षमताओं को कोई फायदा हो रहा है? नहीं.’ सुप्रीम कोर्ट में दायर अपनी याचिका में अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा और प्रशांत भूषण ने भी यह सवाल उठाया था.
सवाल और भी हैं. रफाल भारतीय वायु सेना के पास आने वाला सातवां लड़ाकू विमान है जो सुखोई और मिराज जैसे दूसरे विमानों के साथ अपनी सेवाएं देगा. अपने एक लेख में रक्षा विशेषज्ञ राहुल बेदी कहते हैं कि इससे पहले से ही कम बजट के चलते रखरखाव की चुनौतियों से जूझ रही वायुसेना की मुश्किलें बढ़ना भी तय है.
चूंकि सौदे का फैसला करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही थे (यहां तक कि तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर तक को इसके बारे में पहले से पता नहीं था) तो चूक की जिम्मेदारी उन पर ही आनी थी. और यह सरकार के लिए बड़ी किरकिरी का विषय होता, इसलिए कुछ लोग मानते हैं कि इससे निपटने के लिए कुछ भी साफ-साफ न बताने की रणनीति अपनाई गई. वैसे कुछ समय पहले ही यह खबर भी आई थी कि रक्षा मंत्रालय ने 2015 में ही प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) पर रफाल सौदे के मामले में समानांतर बातचीत का आरोप लगाते हुए इस पर नाराजगी जाहिर की थी. मंत्रालय का कहना था कि इससे सौदेबाजी के मोर्चे पर उसकी स्थिति कमजोर हुई है.
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