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दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी हारी तो क्या होगा ?

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केजरीवाल सरकार दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के बड़े-बड़े दावे करती है और खूब प्रचार-प्रसार भी हो रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि बीते पांच साल में दिल्ली में एक भी नया स्कूल नहीं खुला है, जबकि दावा और वादा पांच सौ नए स्कूल खोलने का था.

दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय शीला दीक्षित के नेतृत्व में कांग्रेस ने दिल्ली विधानसभा के तीन चुनाव जीते, और एक में हार का सामना करना पड़ा, जिस चुनाव में कांग्रेस को हार मिली वह 2013 का चुनाव था. शीला दीक्षित 2013 का चुनाव भी जीत सकती थीं लेकिन उन्होंने दिल्ली के विकास का रास्ता रोकने वाले उसूलों से समझौता नहीं किया. शीला दीक्षित के लिए भी दिल्ली वालों को बिजली बिल की सब्सिडी देना और मुफ्त में पानी देना कोई मुश्किल काम नहीं था, क्योंकि 15 साल सरकार चलाने के बाद उन्हें अच्छी तरह पता था कि किसी और मद का पैसा किसी अन्य मद में कैसे डाला जा सकता है और निजी बिजली कंपनियों को कैसे खुश किया जा सकता है, लेकिन शीला दीक्षित ने ऐसा इसलिए नहीं किया क्योंकि इससे दिल्ली के विकास की राह में दिक्कतें आ जातीं.

उन्हें मालूम था कि यह दोधारी तलवार है, एक तरफ दिल्ली के विकास के लिए जरूरी फंड में कमी आ जाती, जिसके चलते विकास के प्रोजेक्ट अधर में लटकते और दूसरी तरफ अगर लोगों को मुफ्तखोरी की एक बार आदत पड़ता जाती तो जनाता का विकास प्रभावित होता.

बहरहाल दिल्ली विधानसभा चुनाव में अब एक महीने का वक्त बचा है और मौजूदा स्थिति यह है कि केजरीवाल सरकार की वापसी के साफ आसार दिख रहे हैं, लेकिन स्थितियां बदलने के भी संकेत नजर आ रहे हैं. 2013 के चुनाव में सबकी यही राय थी कि शीला दीक्षित सरकार की वापसी तय है, लेकिन नतीजों में शीला दीक्षित की पार्टी यानी कांग्रेस तीसरे नंबर पर पहुंच गई. उसके हिस्से में दिल्ली की 70 में से सिर्फ 8 सीटें आईं. यह 8 सीटें भी वह थीं जहां मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में हैं. वजह साफ थी कि कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद मुस्लिम वोटर ने शीला दीक्षित का साथ दिया.

इसमें कोई दो राय नहीं है कि शीला दीक्षित के दौर में दिल्ली ने जो विकास किया वह आज भी नजर आता है. आज दिल्ली में मुफ्त पानी और बिजली के जीरो बिल की बातें हो रही हैं, और दिल्ली के करीब 28 लाख बिजली उपभोक्ताओं के जीरो बिल ही आए हैं, लेकिन विकास या इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करें तो, बीते पांच साल में केजरीवाल सरकार का रिकॉर्ड खाली कागज नजर आएगा.

केजरीवाल सरकार दिल्ली की शिक्षा व्यवस्था को सुधारने के बड़े-बड़े दावे करती है और खूब प्रचार-प्रसार भी हो रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि बीते पांच साल में दिल्ली में एक भी नया स्कूल नहीं खुला है, जबकि दावा और वादा पांच सौ नए स्कूल खोलने का था. पुराने स्कूलों की मरम्मत कराकर और रंग-रोगन कर उन्हें ऊपरी तौर से चमका जरूर दिया गया है, लेकिन दसवीं और बारहवीं के नतीजे पहले के मुकाबले बेहद खराब हो गए हैं. दिल्ली जैसे राज्य के लिए यह चिंता की बात है, क्योंकि स्कूल की पहचान उसकी इमारत से नहीं बल्कि वहां के नतीजों से होती है. इन पांच सालों में न तो की नया डिग्री कॉलेज खुला और न ही कोई नया विश्वविद्यालय.

स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो केजरीवाल सरकार मुहल्ला क्लीनिक का खूब विज्ञापन कर रही है. लेकिन मुहल्ला क्लीनिक के नाम पर भ्रष्टाचार को खूब बढ़ावा दिया गया. इतना ही नहीं इन मुहल्ला क्लीनिक के चलते दिल्ली में पहले से काम कर रही डिस्पेंसरी व्यवस्था ध्वस्त हो गई. आरोप है कि मुहल्ला क्लीनिक सिर्फ आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों को आर्थिक फायदा पहुंचाने और उन्हें खुश करने के लिए शुरु किए गए. इन पांच सालों के दौरान एक भी नया अस्पताल नहीं खोला गया और न ही पहले से मौजूद अस्पतालों में बेड की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई.

सार्वजनिक परिवहन यानी पब्लिक ट्रांसपोर्ट की बात करें तो स्पष्ट होता है कि बीते पांच साल के दौरान डीटीसी के बेड़े में एक भी नई बस शामिल नहीं की गई. ऐसे ही मेट्रो के फेज-4 यानी चौथे फेज के लिए कितनी समसयाएं खड़ी की गईं और यह कितनी देर से शुरु हो सका, यह किसी से छिपा नहीं है. इंफ्रास्ट्रक्चर के नाम पर दिल्ली में कुछ नया नहीं हुआ. बीते 5 वर्षों में दिल्ली में सिर्फ 3 किलोमीटर नई सड़क बनाई गई. एक भी नया फ्लाइओवर नहीं बना, सिर्फ पहले से बने बारापुला फ्लाइओवर पर पहले से मंजूर योजनाओं को ही आगे बढ़ाया गया. जाहिर है इस सबके का कारण पैसे की कमी ही है.

यह भी पढ़े : कांग्रेस को गेम से बाहर समझा जा रहा है,लेकिन कांग्रेस दिल्ली में सारे समीकरण ध्वस्त कर सकती है

दिल्ली में कारोबार और नौकरियों के अलावा कमाई का और दूसरा कोई साधन नहीं है, और दोनों ही मोर्चों पर दिल्ली की केजरीवाल सरकार और केंद्र क बीजेपी सरकार नाकाम रही हैं. इन दोनों सरकारों को इसकी कोई चिंता भी नजर नहीं आती. नोटबंदी और जीएसटी के कारण कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और वैश्विक मंदी के कारण लोगों की नौकरियां जा रही हैं. इसी बीच में नागरिकता संशोधन कानून और एनआरसी को लेकर समाज में गहरी खाई बनती जा रह है. इस सबके चलते कारोबार ठप हुए हैं और बेरोजगारी आसमान छू रही है.

सीएए और छात्रों के खिलाफ बर्बरता दिल्ली चुनाव के बड़े मुद्दे बन चुके हैं. बीजेपी जहां अनाधिकृत कालोनियों को मंजूरी देने और नागरिकता संशोधन कानून को लेकर सांप्रदायिकता के मुद्दे पर चुनाव में उतरी है, वहीं आम आदमी पार्टी बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य में अपने मुंह मियां मिट्ठू बन रह है. इसके विपरीत कांग्रेस अपने दौर के काम और समाज में मौजूदा बेचैनी को लेकर जनता के बीच में है. यहां गौरतलब है कि बीते करीब एक माह से लगभग सभी न्यूज चैनलों पर केजरीवाल के विज्ञापन दिख रहे हैं, और इस पर खर्च होने वाला पैसा दिल्ली की जनता का है.

दिल्ली में बीजेपी का अपना 33 फीसदी कैडर वोटन माना जाता है, जो बुरी से बुरी स्थिति में भी मिल ही जाता है. 2013 के चुनाव में बीजेपी को 33 फीसदी वोट और 32 सीटें मिली थीं, लेकिन 2015 के चुनाव में उसके वोट शेयर में एक फीसदी से भी कम की गिरावट हुई है और उसे 29 सीटों का नुकसान हुआ था. 2015 में बीजेपी को 32.3 फीसदी वोट मिलने के बावजूद उसके हिस्से सिर्फ तीन सीटें आई थीं. बीजेपी को इतनी कम सीटें मिलने का कारण था कि 2013 में कांग्रेस का करीब 24 फीसदी वोट 2015 में गिरकर 10 फीसदी से भी कम हो गया था, और उसका सारा वोट आम आदमी पार्टी के हिस्से में चला गया था. यही कारण था कि 2013 में आम आदमी पार्टी का वोट शेयर 29 फीसदी से बढ़कर 2015 में 54.3 फीसदी हो गया था. इसके चलते कांग्रेस 2013 में जीती हुई सभी 8 सीटें हार गई थी और आम आदमी पार्टी 2013 के 28 सीटों से बढ़कर 67 सीटों पर पहुंच गई थी.

इन आंकड़ों के संदर्भ में देखें तो दिल्ली विधानसभा चुनावों की चाबी कांग्रेस के हाथ में है.आम आदमी पार्टी की कोशिश है कि कांग्रेस को चुनावी तस्वीर से दूर रखा जाए ताकि उसकी सफलता में कोई रोड़ा न रहे.ध्यान रहे कि आम आदमी पार्टी की हालत लोकसभा चुनाव, दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव और निकाय चुनावों में बहुत खराब रही है.

2020 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के लिए एक अच्छी स्थिति यह है कि हाल ही में उसने झारखंड समेत कई राज्यों में चुनावी सफलता हासिल की है और नागरिकता संशोधन कानून और छात्र आंदोलन के केंद्र में भी वह बढ़चढ़कर हिस्सा लेती नजर आई है. इन दोनों आधार पर आम लोगों के बीच कांग्रेस की छवि अच्छी बन रही है जिसके चलते आम आदमी पार्टी और बीजेपी दोनों के लिए मुश्किलें पैदा हो सकती हैं.

वैसे एक बात तो स्पष्ट है कि दिल्ली में बीजेपी को जो भी वोट मिल सकते हैं या मिलते रहे हैं वह सिर्फ नरेंद्र मोदी के नाम पर ही मिल सकते हैं, लेकिन मौजूदा हालात में साफ दिख रहा है कि पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी और हाल के सीएए के बाद बीजेपी का कोर वोटर भी उससे नाराज है. संभावना यह है कि शायद ये वोटर मतदान के लिए निकले ही नहीं. अगर ऐसा होता है तो बीजेपी के लिए दो-चार सीट हासिल करना भी टेढ़ी खीर साबित होगी.

रहा सवाल आम आदमी पार्टी का तो दिल्ली के अलावा उसका किसी राज्य में कोई खास वजूद है ही नहीं और दिल्ली में भी जिस तरह गैर मुस्लिम वोटर को नाराज न करने की खातिर केजरीवाल ने नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों से खुद को दूर रखा है, वह उसके लिए मुसीबत बन सकता है. इसके अलावा आम आदमी पार्टी के पक्ष में टीना फैक्टर (कोई और विकल्प नहीं) भी काम नहीं कर सकता, क्योंकि टिकट बंटवारे में आम आदमी पार्टी में सिर फुटव्वल होना उसका इतिहास रहा है. टिकट न मिलने से पैदा होने वाली बगावत आम आदमी पार्टी को महंगी पड़ सकती है और इसका सीधा फायदा कांग्रेस को ही होता दिखेगा.

कुल मिलाकर दिल्ली के चुनाव काफी रोचक होने वाले हैं, और बीजेपी अगर कुछ बेहतर नहीं कर पाती तो यह सिर्फ बीजेपी की नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की सीधी हार होगी.

यह भी पढ़े : आर्थिक मोर्चे पर भारत को फिर झटका

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