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मध्य प्रदेश की शिवराज सिंह चौहान सरकार के क्या बुरे दिन शुरू होने वाले हैं?

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मध्य प्रदेश की सवा दो महीने पुरानी शिवराज सिंह चौहान सरकार के क्या बुरे दिन शुरू होने वाले हैं? राजनीतिक गलियारों में यह सवाल गूँजने लगा है.
दरअसल, शिवराज सिंह अपनी काबीना का बहुप्रतीक्षित विस्तार करने जा रहे हैं और माना जा रहा है कि मंत्री पद के लिए अंदरुनी विरोध तेज़ होने के आसार हैं. संभावना है कि एक-दो दिन में मंत्रियों को शपथ दिलाई जाएगी. शिवराज सिंह चौहान 23 मार्च को चौथी बार मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने हैं. कोरोना महामारी के बीच शपथ लेने वाले मुख्यमंत्री चौहान ने 28 दिनों तक बिना किसी मंत्री के ही अकेले सरकार चलाई. दबाव बढ़ा और सवाल उठे तो 21 अप्रैल को मिनी मंत्रिमंडल बनाया. मुख्यमंत्री पद की रेस में नंबर टू रहे नरोत्तम मिश्रा को कैबिनेट में लिया. पार्टी में धुर विरोधी कमल पटेल को ना चाहते हुए भी काबीना में जगह दी. आदिवासी वर्ग की होने की वजह से मीना सिंह को मंत्री बनाया गया.
इन तीनों के अलावा बीजेपी की सत्ता में वापसी कराने में अहम रोल निभाने वाले पूर्व केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया के समर्थक ग़ैर विधायक तुलसी सिलावट और गोविंद सिंह राजपूत को मंत्री बनाया गया. शिवराज द्वारा 21 अप्रैल को गठित किये गये मिनी मंत्रिमंडल के बाद से मंत्री पद के दावेदार बीजेपी के अनेक वरिष्ठ विधायक ख़ासे खफा हैं. कोरोना संक्रमण के फैलाव और राज्यपाल लालजी टंडन के अस्वस्थ हो जाने की वजह से काबीना का विस्तार टलता रहा.
विस्तार अब होने जा रहा है. संभावना है कि यह विस्तार कल यानी 30 जून को हो सकता है. मुख्यमंत्री शिवराज और पार्टी की प्रदेश इकाई के रणनीतिकार रविवार से दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं. पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा से लेकर अमित शाह तक से शिवराज की चर्चा हो गई है. दिल्ली से छनकर भोपाल आ रही ख़बरों के अनुसार मुख्यमंत्री शिवराज की आज शाम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात होगी. मुलाक़ात को काबीना के विस्तार से जोड़कर देखा जा रहा है.
मध्य प्रदेश विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 230 है. इस मान से काबीना में अधिकतम 35 सदस्य लिये जा सकते हैं. शिवराज समेत कुल छह सदस्य अभी कैबिनेट में हैं. कांग्रेस से बीजेपी में आए दो ग़ैर विधायकों को मंत्री बनाया जा चुका है. बीजेपी के चार ही सदस्य (मुख्यमंत्री सहित) काबीना में हैं. कबीना में फ़िलहाल 29 मंत्रियों की जगह ही रिक्त है. बीजेपी में मंत्री पद के दावेदारों की फेहरिस्त 45 के लगभग है. तीन से लेकर सात-आठ बार तक के विधायक बीजेपी खेमे में हैं. ये मानकर चल रहे हैं कि उनको काबीना में जगह मिलेगी.
उधर बीजेपी की सरकार बनवाने के पहले ज्योतिरादित्य सिंधिया से हुए ‘समझौते’ के तहत एक दर्जन के लगभग ग़ैर विधायक (विधायक पद छोड़कर कांग्रेस से बीजेपी में आये नेता) मंत्री पद की उम्मीद बांधे बैठे हैं. शिवराज ने दो को मंत्री बना दिया है. नौ से दस कांग्रेस के पुराने चेहरों को ‘एडजस्ट’ करना बाक़ी है. विधायक पद छोड़कर मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार बनवाने वाले प्रद्युम्न सिंह तोमर, इमरती देवी, महेंद्र सिसोदिया, प्रभुराम चौधरी, राज्यवर्द्धन सिंह दत्तीगाँव, एदल सिंह कंसाना, बिसाहू लाल सिंह और हरदीप सिंह डंग मानकर चल रहे हैं कि उन्हें मंत्री बनाया जायेगा
मुख्यमंत्री शिवराज और पार्टी के रणनीतिकारों के सामने सबसे बड़ा संकट ‘किसे छोड़ें’, ‘किसे लें’ का है. शिवराज सिंह 2005 से 2013 तक तीन बार मुख्यमंत्री रहे. तेरह सालों के कार्यकाल में कई सहयोगी विधायकों को मंत्री बनाये जाने का झुनझुना वे पकड़ाते रहे. मंत्री नहीं बनाया. मध्य प्रदेश में फ़िलहाल चौथी बार की उनकी सरकार ज़रूरी नंबर गेम की बॉर्डर पर है. कमलनाथ सरकार भी ऐसे ही गणित से बनी थी.मन की नहीं हुई तो कांग्रेस के ही विधायकों ने अपनी सरकार को गिरा दिया.
मंत्री पद के बीजेपी के दावेदार विधायक भी अब ‘सब्र’ के मूड में नहीं हैं. यही वजह रही कि मंत्रिमंडल का विस्तार टलता रहा. प्रेक्षकों का मानना है कि काबीना का विस्तार होते ही बीजेपी में असंतोष बढ़ेगा. विस्तार के बाद संभावित डैमेज को कंट्रोल करना बीजेपी और शिवराज के लिए आसान नहीं होगा.
मध्य प्रदेश की तीन राज्यसभा सीटों के लिए हाल ही में हुए चुनाव में बीजेपी की ओर से क्रॉस वोटिंग हुई थी. गुना विधायक गोपीलाल जाटव पर क्रॉस वोटिंग का आरोप रहा. पार्टी उनसे जवाब-तलब कर रही है. जाटव के अलावा बीजेपी के वरिष्ठ विधायक जुगल किशोर बागड़ी का वोट निरस्त हो गया था. इस ‘डबल झटके’ को बीजेपी भूली नहीं है. फूँक-फूँककर क़दम आगे बढ़ाने के बावजूद मंत्रिमंडल के विस्तार के बाद विरोध तेज़ होने की संभावनाओं से पार्टी के रणनीतिकार भी इनकार नहीं कर रहे हैं.
कैबिनेट के विस्तार के बाद विभागों के वितरण में अपनों (बीजेपी के विधायकों) और ग़ैर विधायकों (सिंधिया समर्थकों) को साधना भी शिवराज के लिए आसान नहीं होगा. जिन समझौतों के तहत बीजेपी की सत्ता में वापसी हुई है, उसे देखते हुए शिवराज के सामने ‘इधर कुआँ और उधर खाई’ वाले हालात हैं. मध्य प्रदेश कांग्रेस और उसके मुखिया कमलनाथ, बीजेपी में संभावित विरोध का लाभ उठाकर सत्ता में वापसी का सपना संजोये बैठे हुए हैं.
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