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उत्तर प्रदेश का चुनावी एजेंडा सेट हो चुका है

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लखीमपुर खीरी का मामला (Lakhimpur Kheri Violence) उत्तर प्रदेश की राजनीति में असर करीब करीब वैसे ही दिखाने लगा है जैसे बिहार चुनाव के पहले सुशांत सिंह राजपूत केस. हो सकता है राजनीतिक तौर पर ये मामला भी लंबा न खिंच सके, जो हाल बिहार चुनाव में देखने को मिला था. शुरू में सुशांत सिंह राजपूत केस को लेकर ऐसा लगा जैसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन सकता है, लेकिन पटना से दिल्ली और मुंबई तक बीजेपी की तमाम कोशिशों के बावजूद वो चुनाव की तारीख आने से पहले ही अप्रासंगिक होने लगा था, लखीमपुर खीरी में चर्चित आरोपी आशीष मिश्रा की गिरफ्तारी के बाद अब केंद्रीय गृह राज्य मंत्री के इस्तीफे की मांग जोर पकड़ रही है.
सुप्रीम कोर्ट के स्वतः संज्ञान में लेकर यूपी की योगी सरकार को खरी खोटी सुनाये जाने के बाद यूपी पुलिस ने सख्ती दिखायी और गिरफ्तारी के बाद रिमांड पर पूछताछ चल रही है. आशीष मिश्रा सहित अब तक लखीमपुर खीरी केस में चार आरोपियों की गिरफ्तारी हो चुकी है. चौथा आरोपी अंकित दास है जिसे आशीष मिश्रा का करीबी बताया जाता है – और जिस थार जीप से किसानों को कुचले जाने की बात है, उसके ठीक पीछे चल रही फॉर्च्यूनर का रजिस्ट्रेशन अंकित दास के नाम पर ही बताया जा रहा है. ऐसा लगा था कि आशीष मिश्रा की गिरफ्तारी के साथ ही सत्ताधारी बीजेपी ने अपनी भूमिका की इतिश्री कर ली है, लेकिन तभी यूपी बीजेपी अध्यक्ष स्वतंत्रदेव सिंह ने नेतागिरी को फॉर्च्यूनर से जोड़ते हुए बयान देकर नया ट्विस्ट ला दिया, मतलब, अजय मिश्रा (Ajay Mishra) के मंत्री पद खतरे की तलवार लटकी हुई है.
मतलब, ये भी हो सकता है कि बीजेपी नेतृत्व को लखीमपुर खीरी केस को किसानों की तरफ मोड़ कर खुद को अलग करने के लिए एक सेफ पैसेज की तलाश हो सकती है – और जैसे ही ऐसा कोई मौका मिलता है अजय मिश्रा का केंद्रीय मंत्रिमंडल से पत्ता साफ भी हो सकता है. कुछ कुछ वैसे ही जैसे मीटू मुहिम के बीच आरोपों के घेरे में फंसे एमजे अकबर से इस्तीफा लेकर केंद्र की बीजेपी सरकार ने पीछा छुड़ा लिया था.
यूपी में चुनावी माहौल तो प्रधानमंत्री मोदी की बनारस रैली, अमित शाह और प्रियंका गांधी (Priyanka Gandhi) के लखनऊ दौरे, मायावती के ब्राह्मण सम्मेलन और अखिलेश यादव के वर्क फ्रॉम हो पॉलिटिक्स से बाहर निकलते ही शुरू हो गया था. लेकिन लखीमपुर खीरी हिंसा के बाद हरकतें काफी तेज हो गयी हैं. ध्यान देने वाली एक विशेष बात ये भी है कि साथ में किसान आंदोलन भी नये सिरे से जोर पकड़ने लगा है जो बीजेपी की डबल मुश्किल की तरफ इशारे कर रहा है.
प्रियंका गांधी वाड्रा ने बनारस रैली के बाद राहुल गांधी और कांग्रेस के सीनियर नेताओं के साथ राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद से मुलाकात (Congress Leaders meet President) कर ज्ञापन सौंप दिया है और अखिलेश यादव भी रथयात्रा लेकर निकल पड़े हैं. अब तो देखना ये है कि केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा को बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा डायल करते हैं या नहीं, जैसे जुलाई, 2021 की एक सुबह अचानक कई तत्कालीन मंत्रियों की सुबह की चाय का जायका भी बिगाड़ दिया था!
3 से 13 अक्टूबर तक
लखीमपुर खीरी केस को लेकर कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के पास ठीक उसी अंदाज में पहुंचा जैसे दिल्ली दंगों के बाद गया था. तब कांग्रेस डेलिगेशन की अगुवाई कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी ने खुद की थी, लेकिन इस बार नेृत्व का जिम्मा बेटे-बेटी के पास रहा. वैसे भी पंजाब कांग्रेस संकट से जूझने में दोनों भाई बहन राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा को ही कांग्रेस की नयी लीडरशिप के रूप में देखा जाने लगा है. सोनिया गांधी तो अपने साथ पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी साथ लेकर गयी थीं, लेकिन राहुल-प्रियंका के साथ गुलाम नबी आजाद, मल्लिकार्जुन खड़्गे और एके एंटनी जैसे सीनियर नेता ही रहे.
मुलाकात के बाद राहुल गांधी के साथ साथ प्रियंका गांधी ने भी मीडिया से बात की जिसमें बस एक ही बात पर जोर रहा – ये डेलिगेशन पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए उनकी तरफ से मिला है. सोनिया गांधी और राहुल-प्रियंका के डेलीगेशन दोनों ही के निशाने पर केंद्रीय गृह मंत्रालय ही है, तब सोनिया गांधी ने राष्ट्रपति से मिल कर अमित शाह को बर्खास्त करने की मांग की थी और अभी अमित शाह के जूनियर सहयोगी अजय मिश्रा को हटाने की मांग की गयी है. तब पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह ने ये भी बताया था कि राष्ट्रपति से मोदी सरकार को राजधर्म की याद दिलाने की भी गुजारिश की गयी थी.
जैसे ही राष्ट्रपति के सामने कांग्रेस की अमित शाह को हटाने की मांग सामने आयी बीजेपी की तरफ से 2020 के दिल्ली दंगों के समानांतर 1984 के सिख दंगों का मुद्दा उठाकर हमला बोल दिया गया और ये तो कांग्रेस की ऐसी कमजोर नस है जो सवाल उठते ही खामोश कर देता है, तब भी ऐसा ही हुआ – देखना होगा बीजेपी के पास कांग्रेस के खिलाफ काउंटर करने का वैसा ही कोई सियासी औजार है या नया नुस्खा अपनाया जाता है?
कांग्रेस के पक्ष में एक बात जरूर जाती है कि प्रियंका गांधी को पार्टी में औपचारिक एंट्री देने के बाद से अब तक ऐसा रिस्पॉन्स नहीं मिला था जितना लखीमपुर खीरी की वजह से मिला है. तब तो हाल ये रहा कि बतौर कांग्रेस महासचिव पहली बार लखनऊ पहुंची प्रियंका गांधी वाड्रा को पुलवामा आतंकी हमले के चलते तत्काल दौरा रद्द करना पड़ा था. बीते 3 अक्टूबर से लेकर 13 अक्टूबर तक प्रियंका गांधी हर दिन सुर्खियों का हिस्सा बनी हैं और राष्ट्रीय मीडिया में छायी हुई हैं.
मुंबई में गिरफ्तार शाहरूख खान के बेटे आर्यन खान के ग्लैमर दबदबे के बावजूद, प्रियंका गांधी वाड्रा 3 अक्टूबर की रात साढ़े बारह बजे लखनऊ की सड़कों पर पैदल ही निकल पड़ी थीं और फिर गिरफ्तारी के बाद रिहाई और लखीमपुर खीरी से गुजरते हुए बनारस में रैली करने और दिल्ली लौट कर राष्ट्रपति भवन तक. राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद भी प्रियंका गांधी वाड्रा ने उन बातों को ही आगे बढ़ाने की कोशिश की है जो बनारस रैली में कहा था- हमें जेल में डालिये…हमें मारिये… हमें कुछ भी कर दीजिये – हम लड़ते रहेंगे- जब तक वो गृह राज्य मंत्री इस्तीफा नहीं देते, हम लड़ते रहेंगे, लड़ते रहेंगे, लड़ते रहेंगे.
प्रियंका गांधी ने मीडिया से कहा, हम लोगों ने राष्ट्रपति से मुलाकात करके मांग रखी है कि इस मामले की जांच सिटिंग जज से कराई जाये. निष्पक्ष जांच हो इसलिए गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा को बर्खास्त किया जाये- क्योंकि जब तक वो बर्खास्त नहीं होंगे तब निष्पक्ष जांच नहीं होगी… ये सिर्फ पीड़ित परिावरों की ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश और देश की मांग है. राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद भी प्रियंका गांधी वाड्रा का जोर एक ही बात पर रहा, हम सिर्फ न्याय चाहते हैं…
बैकफुट पर आ चुकी बीजेपी को मौके का इंतजार
यूपी में प्रियंका गांधी की सक्रियता का असर अखिलेश यादव पर वैसा ही हुआ लगता है जैसा ममता बनर्जी के दिल्ली दौरे के वक्त राहुल गांधी पर हुआ था. अखिलेश यादव के साथ साथ उनके चाचा शिवपाल यादव भी एक्टिव हो गये हैं. समाजवादी विजय रथ के साथ ही सामाजिक परिवर्तन यात्रा पर निकल पड़े हैं. हालांकि, अखिलेश यादव नहीं मानते कि प्रियंका गांधी के एक्टिव होने से समाजवादी पार्टी को कोई नुकसान होने वाला है. अखिलेश यादव कहते हैं. भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस में कितना फर्क है, दोनों की नीतियां एक हैं.
अखिलेश यादव का कहना है कि अगर बीजेपी को उत्तर प्रदेश से नहीं हटाया गया तो ये टायरों से संविधान को कुचल देंगे. लखीमपुर खीरी में किसानों को कुचल दिये जाने के बाद से अखिलेश यादव लगातार टायरों की वैसे ही बात कर रहे हैं जैसे यूपी बीजेपी अध्यक्ष ने फॉर्च्यूनर का इस्तेमाल किया है. स्वतंत्रदेव सिंह ने लखीमपुर खीरी को लेकर जो बयान दिया है, लगता तो ऐसा ही है कि पार्टी अजय मिश्रा से दूरी बनाने की कोशिश कर रही है. बीजेपी के ही एक कार्यक्रम में स्वतंत्रदेव सिंह ने कहा, हम राजनीति में लूटने के लिए नहीं हैं और न ही किसी को फार्च्यूनर से कुचलने के लिए आये हैं.
लखनऊ के जिस कार्यक्रम स्वतंत्रदेव सिंह ने फॉर्च्यूनर का जिस तरीके से जिक्र किया सीधे सीधे उसका कोई मतलब नहीं था. वो कार्यक्रम बीजेपी के अल्पसंख्यक मोर्चे की कार्यसमिति का रहा – और ऐसे मंच से वो बीजेपी के श्मशान और कब्रिस्तान जैसे एजेंडे को भी आगे बढ़ा सकते थे, लेकिन लखीमपुर खीरी की चर्चा में उनके निशाने पर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा ही रहे. बोले, वोट आपके व्यवहार से मिलेगा.. आप जिस मोहल्ले में रहते हैं, वहां दस लोग आपकी तारीफ करते हैं तो मेरा सीना चौड़ा हो जाएगा… ये नहीं कि जिस मोहल्ले में रहते हैं लोग आपकी शक्ल देख कर छिप जायें- आपको देखकर जनता मुंह न फेरे ऐसा आचरण कीजिये. लोग आपकी शक्ल देख कर छिप जायें – ऐसा बोल कर स्वतंत्रदेव सिंह ने एक तरीके से अजय मिश्रा और उनके बेटे आशीष मिश्रा के अपने इलाके में छवि की तरफ ही इशारा किया है.
जिस तरह से आशीष मिश्रा के साथ पुलिस की पूछताछ के दौरान अजय मिश्रा बीजेपी दफ्तर में कार्यकर्ताओं से कह रहे थे कि वो कुछ ऐसा वैसा होने नहीं देंगे – और घूम घूम कर दावा करते रहे कि उनका बेटा बेकसूर है, लगता है बीजेपी में नीचे से ऊपर तक अजय मिश्रा का ये व्यवहार किसी को अच्छा नहीं लगा है. और अजय मिश्रा के खिलाफ सिर्फ प्रियंका गांधी और अखिलेश यादव ही नहीं, किसान नेता राकेश टिकैत भी पीछे नहीं लगते. एक वजह ये भी हो सकती है कि यूपी सरकार और किसानों के बीच समझौता करना में राकेश टिकैत की भूमिका पर भी शक जताया गया है और हो सकता है आशीष मिश्रा की ही तरह मंत्री पद से हटाकर अजय मिश्रा की गिरफ्तारी की मांग कर राकेश टिकैत भी अपनी छवि सुधारने के अभियान में जुट गये हों.
हिंसा में मारे गये किसानों के लिए आयोजित अंतिम अरदास से प्रियंका गांधी और वहां पहुंचे आरएलडी नेता जयंत चौधरी को तो दूर ही रखा गया, लेकिन आगे का जो ऐक्शन प्लान पेश किया वो सत्ताधारी बीजेपी के लिए सिर दर्द बढ़ाने वाला ही है. राकेश टिकैत का कहना है कि जब तक बाप-बेटा दोनों जेल में बंद नहीं होंगे, आंदोलन जारी रहेगा. राकेश टिकैत ने कहा कि अभी तक रेड कार्पेट गिरफ्तारी हुई है और आरोपियों को गुलदस्ता देकर बुलाया गया है. साथ ही, 15 अक्टूबर से 26 अक्टूबर तक आंदोलन तेज करने का फैसला हुआ है – आखिरी दिन लखनऊ में महापंचायत कराया जाना तय हुआ है.
लखीमपुर खीरी का वाकया मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह सभी के लिए दोहरी मुश्किल बन पड़ा है. एक तो किसानों का मामला पहले से ही सिरदर्द बना हुआ है, दूसरा केंद्रीय मंत्री के बेटे का मुख्य आरोपी बन जाना – ऊपर से विपक्षी दल और किसान नेता पूरे मामले को ऐसे पेश कर रहे हैं कि सत्ता के दम पर मंत्री के बेटे को बचाने की कोशिश हो रही है. बीजेपी नेतृत्व की असली चिंता लोगों के बीच जा रहा ये मैसेज ही है. वो भी जब पार्टी चुनाव का सामना करने जा रही है.
स्वतंत्रदेव सिंह के फॉर्च्यूनर वाले बयान से तो ऐसा ही लगता है जैसे अजय मिश्रा से निजात पाने का फैसला लिया जा चुका है, लेकिन बीजेपी नेतृत्व को फिक्र तो इस बात की भी होगी ही कि जब एक गैंगस्टर विकास दुबे के एनकाउंटर को मुद्दा बनाकर ब्राह्मण वोट बैंक की सहानुभूति हासिल करने की कवायद हो सकती है तो महज बेटे के आरोपी होने भर से ही मंत्री को हटाने की बात कैसे समझायी जाये.
वैसे भी प्रियंका गांधी की आवाज तभी तक बुलंदी से गूंज रही है जब तक कोई और मसला सुर्खियों में ऊपर अपनी जगह नहीं बना लेता, क्योंकि बीजेपी के मीडिया मैनेजमेंट के आगे तो कांग्रेस नेतृत्व वैसे ही बेदम साबित हो जाता है. सत्ता में होने का बीजेपी को अलग से फायदा मिलता ही है. प्रधानमंत्री मोदी, अमित शाह और जेपी नड्डा मिल कर अजय मिश्रा को हटाने के फैसले पर विचार करते हैं तो आगे ये जवाब देने के लिए तैयार रहना चाहिये कि अजय मिश्रा को मोदी कैबिनेट में शामिल ही क्यों किया गया? क्या बीजेपी नेतृत्व को अजय मिश्रा के गुजरे अतीत का पता नहीं था?
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