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अद्भुत: गुमान की भाषा समझते हैं गाय व सांड, एक इशारे पर कुलांचे मारकर दौड़ा आता है गौ वंश

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सीकर. अक्सर सुनते हैं कि प्रेम की भाषा पशु भी समझते हैं। लेकिन, ये देखना भी है तो पलसाना की मांझीपुरा की ढाणी स्थित नवलगढ़ गौशाला में देखा जा सकता है। जहां गायों की सेवा में जुटे अजमेर के गोयला निवासी गुमान का गोवंश से ऐसा गहरा नाता जुड़ा हुआ है कि दोनों एक दूसरे के भाषा व भाव बड़ी आसानी से समझते हैं। गुमान के संकेतभर से गायों का झुंड 100 मीटर दूर से भी उनकी तरफ कुलांचे मारकर दौड़ा आता है और बेहद स्नेह के साथ उनके इर्द- गिर्द घूमने लगता है। फिर गुमान कभी उनको सहलाकर तो कभी चुंबन से उन पर अपना प्रेम भी उड़ेलते हैं। खास बात ये भी है कि झूंड में वो खूंखार सांड भी शामिल होते हैं, जिन्हें देखते ही एकबारगी तो हर कोई डर जाए। लेकिन, गुमान के प्रेम में वे भी वशीभूत नजर आते हैं। गुमान की ऐसी गो सेवा देखकर लोग उन्हें ‘गोपालÓ भी कहने लगे हैं।
चेहरे व आवाज से पहचानते हैं इच्छानवलगढ़ गौशाला में करीब 185 गोवंश है। जिसमें गायों व सांड से लेकर छोटे छोटे बछड़े भी शामिल है। जिनके अलग अलग नाम है। गुमान की आवाज से ही वे उनके पीछे चल देते हैं। गोवंश की भूख- प्यास और किसी पीड़ा को भी गुमान उनके चेहरे, आवाज और हावभाव से पहचान लेते हैं। उसके हिसाब से वह उनकी हर जरुरत भी तुरंत पूरी करते हैं। गोशाला के अन्य कर्मचारियों के अनुसार गुमान किसी गोवंश पर कभी हाथ नहीं उठाते और ना ही किसी दूसरे को उन्हें पीटने देते हैं। बकौल गुमान गायों को पिटता या पीड़ा में देखकर उनका मन जार जार रोने लगता है। परिवार सहित गौ शाला में ही रहने वाले गुमान का अलसुबह उठने से लेकर देर रात तक गायों की सेवा में ही मगन भाव से जुटे रहते हैं। गौरतलब है कि गुमान बचपन से गो सेवा में जुटे हैं। चितावा व कोछोर जैसी गोशाला में भी अपनी सेवा दे चुके गुमान अपना पूरा भविष्य ही गोसेवा को देने की बात कहते हैं।
अनूठी गोशाला: बछड़ों की अच्छी परवरिश के लिए नहीं बेचते दूधनवलगढ़ गोशाला करीब 2500 बीघा जमीन में स्थित है। प्रबंधक सहित आठ लोगों के स्टाफ वाली इस गोशाला में करीब 30 लाख रुपये का सालाना खर्च होता है। लेकिन फिर भी इसका व्यवसायीकरण नहीं किया गया है। प्रबंधक मनरूप ने बताया कि गायों के दूध से बछड़ों की अच्छी परवरिश हो, इसलिए गोशाला का दूध बाहर नहीं बेचा जाता। गोशाला का पूरा खर्च ट्रस्ट द्वारा ही उठाया जाता है।
इनका कहना है: गोशाला से 20 साल से जुड़ा हूं। यूं तो पूरे स्टाफ का सेवाभाव और यहां की व्यवस्था मुझे अक्सर यहां खींच लाती है। लेकिन, गुमान की सरलता व गायों से उसका लगाव मुझे विशेष आकर्षित करता है। केशर देव, योग गुरू, सीकर

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