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सुप्रीम काेर्ट ने पलटा एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी पर राेक लगाने से जुड़ा अपना डेढ़ साल पुराना फैसला

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जांच की गाइडलाइंस तय करना भी गलत, यह काम कोर्ट का नहीं 

Aajkal Rajasthan News /नई दिल्ली 

सुप्रीम काेर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में तुरंत गिरफ्तारी पर राेक लगाने से जुड़ा अपना डेढ़ साल पुराना फैसला मंगलवार काे पलट दिया। काेर्ट ने कहा कि देश में अब भी एससी-एसटी वर्ग के साथ भेदभाव हाे रहा है। समानता व अधिकाराें के लिए उनका संघर्ष खत्म नहीं हुअा है। वह छुअाछूत, दुर्व्यवहार अाैर सामाजिक बहिष्कार भी झेल रहे हैं। यह मानकर नहीं चला जा सकता कि पूरी की पूरी बिरादरी ही कानून का गलत इस्तेमाल करेगी। सबकाे झूठा अाैर बदमाश समझना मानवीय गरिमा के खिलाफ हाेगा। काेर्ट ने कहा कि एससी-एसटी एक्ट के तहत गिरफ्तारी अाैर जांच से जुड़ी गाइडलाइंस तय करने वाला फैसला गलत था। यह काम काेर्ट नहीं, विधायिका का है। तीन जजाें की बेंच ने 51 पेज के फैसले में कहा कि किसी कानून के गलत इस्तेमाल की संभावना के अाधार पर प्रावधान हल्के नहीं किए जा सकते। 

सुप्रीम काेर्ट के दाे जजाें की बेंच ने 20 मार्च 2018 काे एक अादेश जारी कर एससी-एसटी एक्ट के प्रावधानों काे हल्का कर दिया था। केंद्र सरकार ने उस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दायर की थी। उस पर सुनवाई के बाद जस्टिस अरुण मिश्रा, एमआर शाह और बीआर गवई की बेंच ने पिछला फैसला वापस ले लिया। उल्लेखनीय है कि सरकार ने पिछले साल अगस्त में ही कानून में संशाेधन कर उस फैसले काे निष्प्रभावी कर दिया था। 

फैसले पर उठाए सवाल 

कोर्ट ने कहा कि ये गाइडलाइंस भेदभावकारी हैं। इनके कई जटिल कानूनी परिणाम हो सकते हैं। किस आधार पर कोई अथाॅरिटी सरकारी नौकर को गिरफ्तार करने की अनुमति देगी? जब जांच पूरी ही नहीं हुई है तो कैसे तय कर सकते हैं कि सरकारी नौकर को गिरफ्तार करना है या नहीं? क्या यह उस अथारिटी के लिए जायज होगा कि वह मामले की केस डायरी को देखे, जिसमें उसने अभियोजन चलाने की अनुमति दी है। 

तीन जजों की बेंच ने कहा : एससी-एसटी वर्ग आज भी समानता, अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहा, उनसे भेदभाव भी हाे रहा है, नहीं मान सकते कि पूरा समाज कानून का दुरुपयाेग करता है।’ 

चार तर्क देकर कोर्ट ने पुराने फैसले पर उठाए सवाल 

झूठा केस काेई भी दर्ज करवा सकता है, इससे जाति का लेना देना नहीं 

काेर्ट ने कहा- यह नहीं मान सकते कि एससी-एसटी कानून का दुरुपयाेग करेंगे व अभिजात्य वर्ग नहीं करेगा। यह भी नहीं कह सकते कि काेई सिर्फ जाति की वजह से झूठा केस दर्ज करवाता है। एेसा काेई भी कर सकता है। एससी-एसटी ताे एफआईआर दर्ज कराने का साहस नहीं जुटा पाते। 

शिकायत बेबुनियाद मिलने की वजह गलत जांच भी हो सकती है। कुछ मामले झूठे हो सकते हैं, जिनमें कोर्ट दखल दे सकता है। एेसे दुरुपयाेग की वजह से कानून नहीं बदल सकते। एनसीअारबी के आंकड़ों के अनुसार 2016 में एससी-एसटी के तहत 47 हजार से अधिक केस दर्ज हुए। इतने केस कानून के दुरुपयोग की वजह से दर्ज नहीं हुए हाेंगे। 

अनुच्छेद 17 में छुआछूत प्रतिबंधित है, 70 साल में छुअाछूत खत्म हुई क्या? 

संविधान के अनुच्छेद 17 में छुआछूत प्रतिबंधित है। क्या खत्म हुई? 70 साल से सरकार का इरादा इसे खत्म करने का तो रहा है, लेकिन यह खत्म नहीं हुई। हम अब भी भाग्य के भरोसे प्रयास कर रहे हैं। 

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अछूत करार लाेग अब भी सामाजिक अधिकारों से वंचित हैं। उन्हें समान नागरिक अधिकार नहीं मिले हैं। अभी तक हम संसाधनों की कमी, उचित योजना और उदासीनता के कारण हरिजनों को मैला ढोने से रोकने के लिए आधुनिक संसाधन तक नहीं दे पाए। क्या वह समान स्तर पर उच्च वर्ग के व्यक्ति से हाथ मिला सकता है? क्या हम मानवीय गरिमा के उस स्तर तक पहुंचने में सक्षम हैं? क्या जातिगत भेदभाव मिटाने में सक्षम हैं? क्या स्वच्छता के आडंबर से हालात सुधर जाएंगे? एेसे हालात अब तक क्यों चल रहे हैं? क्या हम जिम्मेदार नहीं हैं? इन सवालों के जवाब अंतरआत्मा में झांककर ही ढूंढ सकते हैं। 

संरक्षण नहीं दे सकते तो असमानता बढ़ाने के हालात भी नहीं बना सकते 

कोर्ट ने कहा- एससी-एसटी वर्ग ने लंबे समय पीड़ा झेली है। हम उन्हें संरक्षण नहीं दे सकते तो ऐसे हालात में भी नहीं डाल सकते कि असमानता बढ़े। यह मानना कि एससी-एसटी के लोग बदला लेने या पैसे ऐंठने के लिए इसका दुरुपयोग करेंगे, बुनियादी मानवीय समानता के खिलाफ होगा। 

कैसे मान सकते हैं कि झूठी शिकायत से पैसे कमाने या बदला लेने के लिए लोग खुद पर लांछन लगाएंगे। यह उनके जख्माें पर नमक छिड़कना होगा। 

दलित गटर में मर जाते हैं, अाज तक मास्क, आॅक्सीजन सिलेंडर नहीं दे पाए 

आज भी खेतों में मजदूर व बंधुआ मजदूर हैं। कई जगह महिलाओं से मर्यादित व्यवहार नहीं होता। उनका यौन शोषण भी होता है। कई दलित मजदूर गटर साफ करते हुए मर जाते हैं। इनके लिए मास्क या आॅक्सीजन सिलेंडर का इंतजाम भी नहीं है। 

हम उन्हें एेसे मरते नहीं देख सकते। दुर्भाग्य की बात है कि बहुमंजिला इमारतों के साए में लाेग झुग्गियों में रह रहे हैं। 

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