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विलायती छाया बिगाड़ रही सीकर की आबोहवा

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सीकर. रेगिस्तान में हरियाली लाने के लिए अंग्रेजों के जमाने में शेखावाटी में हेलिकॉप्टर से बिखेरे जूली फ्लोरा (विलायती बबूल) के बीज अब भारी मुसीबत बन चुके हैं। इसकी बानगी है कि सीकर जिले के पांच हजार हेक्टेयर में उगा विलायती बबूल जनजीवन के साथ वन्य जीव व प्रकृति की सुंदरता को लील रहा है। सोना उगलने वाली धरा अब वैसी उपजाऊ नहीं रही। कृषि अधिकारियों की मानें तो विलायती बबूल के चलते वन क्षेत्र के निकट करीब 300 हेक्टेयर भूमि बंजर हो गई है। इसके कांटे देसी प्रजाति के पेड़-पौधों को नष्ट कर रहे हैं। विलायती बबूल तलहटी क्षेत्र से अब पहाडिय़ों की ऊंचाई तक फैल चुके हैं। धीरे-धीरे यहां पाई जाने वाली अमूल्य वन व वानस्पतिक सम्पदा को बबूल निगलता जा रहा है। यहां चारों ओर नजर दौड़ाने पर बबूल ही बबूल नजर आने लगे हैं। जैव विविधता के लिए बड़ा खतरा है। अरावली की पहाडिय़ों सहित शेखावाटी में फैला विलायती बबूल देशी पेड़-पौधों की लगभग 500 प्रजातियों को खत्म कर चुका है। समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पेड़-पौधों की रही-सही प्रजातियां भी खत्म हो जाएंगी। शुष्क क्षेत्रों में जल संकट भी गहरा सकता है। यही कारण है कि अरावली की पहाडिय़ों में अब जंगली कदम, आंवला, जामुन, नीम, सीताफल, आम, बरगद, नीम, खेर सहित सैंकड़ों देशी पौधे अब कम दिखाई देने लगे हैं।कुछ काम का नहींअंगे्रजी बबूल की हरियाली के फायदे कम, नुकसान ज्यादा हैं। जिस जमीन पर यह पैदा होता है वहां कुछ और नहीं पनपते देता। इसकी पत्तियां छोटी होती हैं। पर्यावरण की दृष्टि से भी इसका कोई उपयोग नहीं है। यह पेड़ बहुत कम कार्बन सोखता है। विलायती बबूल से पक्षियों की प्रजातियां भी काफी कम हो गई हैं।यह है जूली फ्लोराविलायती बबूल का वैज्ञानिक नाम जूली फ्लोरा है। यह मूल रूप से दक्षिण और मध्य अमरीका तथा कैरिबियाई देशों में पाया जाता है। यह दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और पश्चिम उत्तर प्रदेश में अधिकांशत: है। मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब, उड़ीसा और आंध्र प्रदेश में भी इसके पेड़ मिलते हैं।ये है विलायती बबूल-12 मीटर तक होती है इसकी ऊंचाई-10 सेंटीमीटर तक लंबी होती हैं फलियां-30 तक होती है फलियों में बीजों की संख्या-10 साल उगने योग्य होता है इसका बीजवन्य जीवों की जान ले रहा इसका कांटाजूली फ्लोरा का कांटा इतना सख्त और नुकीला होता है कि इंसानों की बात तो छोडि़ए गाय-भैंस, तेंदूए को भी घायल कर सकता है। इसका कांटा पशुओं ने अगर भूल से निगल लिया तो गले में फंस जाता है।…और फैलता चला गया विलायती बबूलकरीब 40 साल पूर्व जब यह विलायती बबूल प्रदेश में आया तो वन विभाग ने भी इसे लगाया था, लेकिन बाद में इसे रोक दिया गया। आज स्थिति यह है कि इसकी फलियां जानवर खाते हैं, जिससे बीज एक से दूसरे जगह पर गए और यह फैलता चला गया। पड़त और बंजर जमीन पर यह तेजी से फैल रहा है। ग्रामीण क्षेत्र में कांटेदार होने के बावजूद पहले इसे काटकर लकडिय़ां जलाने के काम मे ली जाती थी तो यह ज्यादा पनप नहीं पाया। बाद में जब से गैस चूल्हे का उपयोग बढ़ा इसे लोगों ने काटना कम कर दिया और अब इसके फैलाव में तेजी आ गई है।वन्य जीवों के लिए सबसे बड़ा खतराअरावली में घूमने वाले जीव जंतुओं में काफी कमी आ गई है। अधिकतर जंतु भोजन के अभाव में दम तोड़ गए। नील गाय सबसे ज्यादा अरावली की पहाडिय़ों में होती थी। नील गाय शाकाहारी जीव है। विलायती बबूल के कारण तलहटी के चारागाह खत्म होने से अब ये जानवर समीपवर्ती खेतों में धावा बोलने लगे हैं। खरगोश, सियार, लोमड़ी जैसे छोटे जानवर कम हो चुके हैं। वन क्षेत्रों से छोटे जीव कम हुए तो उन्हें खाने वाले लकड़बग्गा, तेंदुआ गांव की ओर आने लगे हैं।फैक्ट फाइलसीकर का वन क्षेत्र-63,987 हेक्टेयरविलायती बबूल का क्षेत्र-5,275 हेक्टेयरझंझुनूं का भौगोलिक क्षेत्र-5,926 वर्ग किमीझुंझुनूं वन क्षेत्र-405 वर्ग किमीझुंझुनंू में विलायती बबूल- 3,000 हेक्टेयरतैयार हो रहे हैं प्रस्तावजिले में तीन हजार हैक्टेयर क्षेत्र में विलायती बबूल है। वाइल्ड लाइफ एरिया से इन्हें हटाने का कार्य किया जा रहा है। अन्य क्षेत्रों में इन्हें हटाने के लिए नरेगा समेत अन्य मदों में प्रस्ताव तैयार किए जा रहे हैं।आर.के. हुड्डा, डीएफओ, झुंझुनूंरेंजवार सूची मांगीसीकर जिले में जूली फ्लोरा के पौधों को हटाने के लिए वन विभाग ने रेंजवार सूची मांगी है। जल्द ही इन्हें हटाने का प्रस्ताव तैयार किया जाएगा।भीमा राम चौधरी, उपवन संरक्षक, सीकर

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