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घोटाला: ट्यूबवेल के लिए 340 से ज्यादा फर्जी प्रमाण पत्र बनाकर करोड़ों रुपये वसूले

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सीकर. किसानों के कृषि कनेक्शनों में मिलीभगत का बड़ा खेल सामने आया है। जिम्मेदारों की मिलीभगत से अब तक बिजली कनेक्शन के लिए शेखावाटी में 340 से अधिक फर्जी प्रमाण पत्र जारी कर दिए। खास बात यह है कि मिलीभगत के इस खेल में किसानों से 60 हजार से एक लाख रुपए तक की मोटी रकम वसूली गई है। शेखावाटी में सक्रिय इस गिरोह की ओर से वर्ष 2011 से पहले की ट्यूबवेल होने के लिए जारी प्रमाण पत्रों में कई प्रशासनिक अधिकारियों की सील लगाकर फर्जी साइन कर दिए गए। इस मामले में जब शिकायत हुई तो अजमेर डिस्कॉम ने संयुक्त जांच कमेटी गठित की। इसमें सामने आया कि प्रशासनिक अधिकारियों की ओर से जारी कई प्रमाण पत्र पूरी तरह फर्जी है। इस पर डिस्कॉम प्रबंधन ने कनेक्शन प्रक्रिया को तत्काल रुकवा दिया है। सीकर जिले में फतेहपुर व लक्ष्मणगढ़ इलाके के सहायक अभियंता कार्यालयों में इस तरह के जाली प्रमाण पत्रों वाली फाइल जमा हुई है। इस मामले में विद्युत निगम प्रबंधन ने सीकर जिला कलक्टर को पत्र लिखा है कि कौनसे हस्ताक्षर और सील सही है कौनसे फर्जी।
क्यों बनवाए फर्जी प्रमाण पत्र
बिजली निगम की ओर से फिलहाल दो योजनाओं में किसानों को कृषि कनेक्शन जारी किए जा रहे हैं। वर्ष 2011 के बाद सीकर जिला डार्कजोन में शामिल हो गया था। ऐसे में ट्यूबवैल 2011 से पहले का खुदा होने पर ही कनेक्शन जारी होता है। ऐसे में विद्युत निगम की ओर से संबंधित किसान से उपखंड या तहसील प्रशासन की ओर से जारी प्रमाण पत्र मांगा जाता है। इसलिए किसानों की ओर से प्रशासनिक कार्यालयों में सम्पर्क किया जाता है।
ऐसे पकड़ में आया घपला
पिछले दिनों कई किसानों की ओर से अजमेर डिस्कॉम मुख्यालय में शिकायत की गई कि कई किसानों ने दलालों से फर्जी प्रमाण पत्र बनवाए है। इसकी एवज में मोटी रकम भी वसूली जा रही है। इस पर डिस्कॉम प्रबंधन ने फतेहपुर इलाके के कई किसानों के प्रमाण पत्रों की जांच कराई। जांच में शिकायत सही मिली। इसके बाद अब अजमेर डिस्कॉम ने अन्य सहायक अभियंता कार्यालयों में भी किसानों की ओर से दिए प्रमाण पत्रों की जांच शुरू कर दी है।
प्रशासन अधिकारियों का तर्क: हमारे पास ऐसा कोई यंत्र नहीं, जिससे पता लगे कि ट्यूबवैल कब खुदीविद्युत निगम के अधिकारियों की ओर से उपखंड अधिकारी व तहसीलदार को इस संबंध में 30 से ज्यादा बार पत्र लिखे गए। लक्ष्मणगढ़ के तत्कालीन तहसीलदार ने अपने एक पत्र में लिखा कि हमारे पास इस तरह का कोई यंत्र नहीं है जिससे हम पता लगे कि ट्यूबवैल कब खुदी थी। भविष्य में इस संबंध में पत्राचार नहीं करें तो ठीक रहेगा।
विद्युत निगम: कौन कहां से सील लगवा कर ला रहा है हमें क्या पता
मिलीभगत के इस खेल में बिजली निगम के जिम्मेदारों की अपनी सफाई है। निगम अभियंताओं का कहना है कि कौन कहां से सील लगवा कर आ रहा है, इसकी हमें कोई जानकारी नहीं होती। प्रमाण पत्र को कई बार शक होने पर सत्यापन के लिए एसडीएम व तहसील कार्यालय में भिजवाया भी जाता है।
जो अधिकारी चले गए उनके नाम से भी प्रमाण पत्रपत्रिका की पड़ताल में सामने आया कि कई किसानों को दलालों ने उन तहसीलदारों के प्रमाण पत्र भी दे दिए है जिनका यहां से कई महीने तबादला हो गया। अब विद्युत निगम के सामने समस्या यह है कि उनके हस्ताक्षरों का सत्यापन कैसे हो। इस मामले में भी विद्युत निगम और प्रशासनिक अधिकारी दोनों आमने-सामने नजर आ रहे हैं।
इस तरह से होता है खेल…
कृषि प्रमाण पत्र बनाने के लिए सक्रिय दलाल गिरोह की ओर से इस तरह के किसानों पर विद्युत निगम के सहायक अभियंता कार्यालयों के जरिए मुखबिरी की जाती है। यहां बिना प्रमाण पत्र के अभाव में किसान की फाइल को जमा नहीं किया जाता है। इससे परेशान किसान फिर इन दलाल गिरोह के सम्पर्क में आ जाता है। दलाल गिरोह की ओर से ऊंची रसूख दिखाकर तहसीलदार से प्रमाण पत्र बनाने का दावा किया जाता है। लेकिन जैसे ही किसान प्रमाण पत्र के साथ कनेक्शन की गारंटी की बात करता है पैसे बढ़ा दिए जाते हैं। अजमेर डिस्कॉम के अभियंताओं ने खुद जांच में माना कि किसानों से 60 हजार से लेकर एक लाख रुपए में इस तरह के प्रमाण पत्र जारी किए गए है।
तहसीलदार की मुहर से लेकर कांट-छांट का खेलविद्युत निगम ने प्रांरभिक जांच में माना कि 300 से अधिक फाइलों में तहसीलदार के फर्जी प्रमाण पत्र लगाए गए है। वहीं कई फाइल तो ऐसी है जिसमें पहले ट्यूबवैल खुदने की तिथि वर्ष 2011 के बाद की अंकित थी। लेकिन बाद में उस तिथि को वर्ष 2011 से पहले की कर दिया गया।
इनका कहना
कृषि कनेक्शनों की फाइलों में कई प्रशासनिक अधिकारियों के फर्जी प्रमाण पत्र लगे होने की शिकायत मिली थी। टीम ने इस मामले में जांच पूरी कर ली है। जल्द रिपोर्ट मुख्यालय को सौप दी जाएगी।एस एन शर्मा, अधीक्षण अभियंता, ऑडिट, अजमेर डिस्कॉम

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