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NRI Day: विदेश में रहकर इन एनआरआईस् का दिल रहा मारवाड़ी

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सीकर. आज एनआरआई यानी नॉन रेजिडेंट इंडियन डे है। उन इंडियंस का डे, जो फोरेन में बस गए हैंैं। इनमें शेखावाटी के भी सैंकड़ों लोग शुमार है। जिनमें से कइयों ने उपलब्धियां हासिल करने के बाद भी अपनी मिट्टी से लगाव नहीं छोड़ा। यूं कहेंं कि तन विदेश में रहने पर भी उनका मन देसी ही रहा। ऐसे ही कुछ एनआरआईस् से रूबरू करवाएगी यह खास रिपोर्ट:
1. लक्ष्मी निवास मित्तल: स्टील किंग दे रहे कम्प्यूटर एजुकेशन
स्टील किंग के नाम से वल्र्डवाइड पहचान बनाने वाले व फोब्र्स मैगजीन में यूरोपियन बिजनसमैन घोषित लक्ष्मीनिवास मित्तल परिचय के मोहताज नहीं है। 15 जून 1950 में चूरू के सादुलपुर में मोहनलाल व गीता मित्तल के घर जन्मे लक्ष्मीनिवास वल्र्ड के स्टील उत्पादन में 10 परसेंट का हिस्सा रख वल्र्ड की रिचेस्ट पर्सनेलिटी में शुमार है। मारवाड़ी बिजनेसमैन कहे जाने वाले मित्तल 2007 में सादुलपुर आए तो उन्होंने मां गीता देवी मित्तल की स्मृति में पांच करोड़ रुपए से बनाए मॉर्डन सीएचसी का इनॉग्रेशन किया था। चूरू में गल्र्स कम्प्यूटर एजुकेशन को बढ़ावा देने के लिए सादुलपुर व चूरू में खोले गए उनके सेंटर गल्र्स स्टूडेंट्स को अब भी 50 परसेंट डिस्काउंट पर कंप्यूटर कोर्स करवा रहे हैं। आर्सेलर कंपनी के एक्युइजिशन के बाद 2008 में पद्म विभूषण अवार्ड पाने वाले मित्तल का अटेचमेंट ही है कि महज तीन वर्ष की उम्र में फेमिली के साथ कोलकाता सेटल होने के बाद भी तीन बार चूरू आ चुके हैं।
2. दाउद हनीफ पिनारा: फतेहपुर में अस्पताल के लिए दी जमीन
फतेहपुर निवासी व दुबई प्रवासी दाउद हनीफ पिनारा का दिल अब भी इंडिया के लिए धड़कता है। यही वजह है कि कंस्ट्रक्शन के कारोबार से जुड़े दाउद हनीफ वतन लौटने का मौका ढूंढते रहते हैं। फतेहपुर में एजुकेशन व हेल्थ सिस्टम को डेवलप करने के लिए डीएचपी फाउंडेशन के जरिये वह गवर्नमेंट कृष्णा स्कूल को गोद लेकर बिल्डिंग बनाने के अलावा कई स्कूल के स्टूडेंट्स को स्कॉलरशिप व टीएलएम की फेसिलिटी अवेलेबल कराते हैं। स्काउट भवन के निर्माण के अलावा हालिया पीएचसी के लिए एक करोड़ की जमीन डोनेट की है। गल्र्स एजुकेशन के लिए फातिमा स्कूल को जमीन व मस्जिदों में लाइट के लिए सोलर पैनल लगाने जैसी कई छोटी- बड़ी एक्टिविटी उनके सोशल वर्क में शुमार है।
3. डा. भगवान सिंह थालौड़: पेरेंट्स के नाम पर बनाए दो हॉस्पिटल
सीकर के रसीदपुरा निवासी डा. भगवान सिंह थालौड़ बीकानेर वेटेरीनरी यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन कर स्कॉलरशिप से 1969 में अमेरिका गए। वहां एमडी व पीएचडी कर पहले केंट यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर रहे। बाद में खुद का हॉस्पिटल शुरू किया। लेकिन, परिवार और गांव से उनका लगाव कभी नहीं छूटा। अपने पेरेंट्स के नाम और गांव के लिए उन्होंने रसीदपुरा में मां मोहरी देवी के नाम पर पीएचसी व फागलवा में पिता चौधरी बीरमाराम के नाम पर गवर्नमेंट वेटेरीनरी हॉस्पीटल बनवाया। ग्रामीण महिला शिक्षण संस्थान की स्टार्टिंग में भी 20 लाख का सहयोग दिया। 80 वर्ष की ऐज में अब भी वह अपनों से मिलने हर साल गांव आते हैं। जहां बकौल भाई हनुमान सिंह वह बिल्कुल देसी अंदाज में कुछ महीने बिताते हैं। साथ ही गांव में एजुकेशन और हेल्थ सिस्टम डेवलेप करने में जुटे रहते हैं।
4. डा. घासीराम: गल्र्स एजुकेशन को बनाया ऐम
झुंझुनूं के सीगड़ी गांव में लादूराम चौधरी के घर अभावों में जन्मे डॉ घासीराम वर्मा ने पाई- पाई जुटाकर पढ़ाई की। बगड़ में टीचर से कॅरियर शुरू करने वाले वर्मा 1957 में गणित में पीएचडी कर अमरीका के रोडे आईलैण्ड यूनिवर्सिटी किंग्सटन में प्रोफेसर पोस्ट तक पहुंचे। लेकिन, दिल हमेशा हिंदुस्तानी ही रहा। हर साल वह झुंझुनूं आते। एक बार जब 1982 में झुंझुनूं में भरी दोपहर में गल्र्स को पढऩे जाते देखा, तो मन पसीज गया। उसी समय उन्होंने गल्र्स एजुकेशन को अपना ऐम बना लिया। तब से हर साल लाखों रुपए खर्च कर वह इस मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं। रिटायरमेंट के बाद अब भी वह भले ही अमरीका में रह रहे हैं, लेकिन 91 साल की उम्र में भी वह झुंझुनूं आना नहीं भूलते। मन करने पर वह एमडीएस कॉलेज में भी गणित पढ़ाने चले जाते हैं।

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