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ज्योत से ज्योत मिली तो निकले गांव से बाहर, सुख समृद्धि व खुशहाली की बनी हुई है परम्परा

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जजावर. कस्बे में शनिवार को सुख समृद्वि व खुशहाली के लिए बनी परम्परा के अनुसार ग्रामीण गांव बाहर निकले। सभी वर्ग के महिला, पुरूष, बुजुर्ग, बच्चों के साथ गाय, भैंस, भेड़, बकरीयों सहित हीरामन जी की नगाल के नीचे होकर निकले। थानक का इतिहास: कस्बे में स्थित हीरामन जी का थानक 125 वर्ष पूर्व राजपूत वंश राजा मॉनिटोर के काल में बना था। तब से यह परम्परा आज तक चली आ रही है।ऐसे बनती है प्रक्रिया: हीरामनजी के थानक पर एक बड़े प्याले में दो रूई से बनी बाती रखी जाती है जिसमें एक तो जली व दूसरी जली नहीं होती है। जब दोनों बाती में ज्योति प्रकट हो जाती है तब सम्पूर्ण गांव के ग्रामीण हीरामन जी के आदेशानुसार कच्चे सूत के धागे से बने डोर के नीचे होकर गांव से बाहर निकलते है तथा लडï्डू-बाटी बनाते है।आधा किलो दुध ही काफी: जब तक हीरामन जी की ज्योति नही जलती है तब तक हीरामन जी का गोठ्या दिन में सुबह 250 ग्राम व शाम को भी इतना ही दुध लेकर पूरे दिन निराहार रहता है। नेवालाल गोठ्या ने पत्रिका से बातचीत पर बताया कि यह सब शक्ति हीरामन जी ही देते है । ऐसे तो ज्योति पन्द्रह बीस दिन मे जल उठती है । लेकिन कभी-कभी एक महीना भी गुजर जाता है।ज्योति का जलना मामा भानेज का मिलन: ग्रामीण हीरा लाल, रामेश्वर, नेवालाल गोठ्या, ग्यारसी लाल ने बताया कि दोनो ज्योति देव अंश है। किवदंती के अनुसार द्वापर युग के कृष्णावतार के समय कालश देव जो हीरामन जी के मामा थे वे भगवान कृष्ण के समय गायें चराते थे। उसी समय मामा कालशदेव व भानेज हीरामनजी वहां जल रही अखण्ड ज्योति में समा गए थे। तभी से दोनो ज्योति का एक साथ मिलने का तात्पर्य मामा भानेज का मिलन से लिया जाता है। ऐसी परम्परा का निर्वाहन कस्बें की सुख समृद्वि व खुशहाली के लिए किया जाता है।

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