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मैं नहीं पढ़ा लेकिन प्रजा जरूर पढ़े…जानिए कहां के राजा ने यह कहते हुए लगा थी स्कूल-कॉलेजों की झड़ी

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सीकर. सीकर के अंतिम शासक राव राजा कल्याण सिंह की उदारता के किस्सों से सीकर का इतिहास भरा पड़ा है। शिक्षा हो या स्वास्थ्य, धर्म हो या ढांचागत विकास, हर क्षेत्र में योगदान उन्हें आधुनिक सीकर का जनक बनाता है। इतिहासकार महावीर पुरोहित के मुताबिक राजा कल्याण सिंह महज साक्षर थे। वे कहते थे कि मैं नहीं पढ़ा, लेकिन मेरी प्रजा पढऩी चाहिए। इसी के चलते उन्होंने सिल्वर जुबली रोड पर गेस्ट हाउस की जगह स्कूल (एसके स्कूल) के नाम की। 1928-29 में श्री कल्याण हाई स्कूल बना। बजाज रोड पर कन्या पाठशाला, 1946 में इंटर कॉलेज और देवीपुरा में हरदयाल स्कूल भी उन्हीं की देन रही। आजादी के बाद भी 1958-59 में उन्होंने एसके कॉलेज के लिए भवन दिया। एसके अस्पताल, कल्याण सर्किल, सिल्वर जुबली रोड और बजाज रोड पर हरदयाल टॉकीज का लोकार्पण भी 1948 में राव राजा कल्याण सिंह के समय हुआ। इतना ही नहीं 9 जुलाई 1922 को राज्यारोहण के तीन दिन बाद 22 जुलाई को सीकर में पहली ट्रेन भी पहुंची।इतिहासकार महावीर पुरोहित बताते हैं कि राव कल्याण सिंह की उदारता ही थी कि सीकर जिला बन पाया। क्योंकि 15 जून 1954 में सीकर के राजस्थान में शामिल होने के बाद सरकार ने प्रशासन के लिए भवनों की कमी के चलते सीकर को जिला बनाने का प्रस्ताव खारिज कर दिया था। इसकी बजाय झुंझुनूं को जिला बनाकर सीकर को उसमें शामिल किया जा रहा था। लेकिन, इसकी सूचना पर राजा कल्याण सिंह ने कलक्ट्रेट और कोर्ट के लिए तत्कालीन ट्रेवल अस्पताल का भवन सरकार को दे दिया। वहीं, तहसील भवन और पुलिस लाइन भी मुहैया करवा दिया। इसके बाद बद्री नारायण सोढाणी, पुरोहित स्वरूप नारायण, जानकी प्रसाद मारू, दीन मोहम्मद और सोहनलाल दुग्गड़ सरीखे लोगों ने भी सरकार तक मांग पहुंचाई। जिसके बाद सरकार ने एक कमेटी गठित कर उसकी सिफारिश पर सीकर को जिला घोषित किया।1934 में महायज्ञधार्मिक क्षेत्र में भी राव राजा कल्याण सिंह का अहम योगदान रहा। शहर का श्रीकल्याण मंदिर बनवाने के अलावा हर पर्व की शुरुआत वह अपने आवास से करते थे। 1934 में रेलवे स्टेशन के पास राजा कल्याण सिंह ने प्रजापति महायज्ञ करवाया था। जिसमें 4 हजार किलो घी से करीब एक लाख लोगों ने आहुतियां दी थीं। पिता माधव सिंह के उत्तर कृत्य में उन्होंने तीन लाख रुपए खर्च करने के 51 गायें और 25 हजार रुपए दान किए। 2 हजार बीघा जमीन गोचर के लिए भी छोड़ी।बेगार प्रथा बंद कीसीकर जिले में बेगार प्रथा कल्याण सिंह ने ही बंद की। अपने पिता माधव सिंह के श्राद्ध पर उन्होंने यह प्रथा बंद कर कामगार को नकद दिहाड़ी दी और भोजन कराया। इसके अलावा भी कल्याण सिंह कई सामाजिक, धार्मिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यों से जुड़े रहे।[MORE_ADVERTISE1]

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