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150वीं जयंती पर गांधी और गांधीवाद पर दावे: आखिर किसके कितने गांधी ?

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आज महात्मा गांधी की 150वीं जयंती  के अवसर पर भारत के तमाम राजनीतिक दलों एवं केंद्र व राज्य सरकारों ने गांधी जी पर विभिन्न कार्यक्रम करते हुए अपना-अपना दावा गांधी की राजनीतिक विरासत पर ठोक दिया है. हर कोई खुद को गांधी का उपासक एवं अपनी सरकार या पार्टी को गांधीवाद का मॉडल सिद्ध करने के लिए प्रतिबद्ध व प्रयासरत है.

देखते हैं कि कौन कितना गांधी ?

शुरूआत राज्य सरकारों से करें तो झारखंड, गुजरात, हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड समेत समस्त भाजपा शासित राज्यों में लॉ एण्ड ऑर्डर की स्थिति ही गांधीवादी नेताओं और गांधीवादी विचारधारा की वास्तविक स्थिति का ज्ञान करा देती हैं. वहीं कर्नाटक में भ्रष्टाचार के लिए सजायाफ्ता मुख्यमंत्री और विधानसभा भवन में मोबाइल पर पोर्न देखने वाला उपमुख्यमंत्री ही न सिर्फ गांधीवाद वरन् लोकतंत्र के मुंह पर भी कालिख हैं.

अतीत में थोड़ी सी उम्मीद जरूर जगाई थी आम आदमी पार्टी ने, लेकिन अब दिल्ली में केजरीवाल सरकार भी विशुद्ध राजनैतिक दांवपेचों में माहिर हो कर जनता के जी का जंजाल ही बनी है. पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार से भी काफी उम्मीदें रहती हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने अपना संघर्ष वाम दलों के खिलाफ किया है और शायद उनके साथ संघर्षरत रहने के कारण ही स्वयं ममता बनर्जी एवं तृणमूल कांग्रेस में वामदलों की उद्दंडता आ गई है. तृणमूल नेता एवं कार्यकर्ता कहीं भी किसी भी समय गांधीवाद को तिलांजलि देते हुए हाथापाई के लिए तत्पर रहते हैं. बिहार में पहले कांग्रेस, राजदा के साथ गठबंधन में मुख्यमंत्री रहे नीतीश कुमार अब भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री हैं और उन्होंने स्वयं को सुशासन का पर्याय बताया था. जब सत्ता के लिए परस्पर विरोधी विचारधाराओं के साथ उलट-पलट कर गठबंधन कर लिया जाए तो सुशासन का स्तर समझा जा सकता है. अब बिहार के सुशासन की दास्तान तो दुनिया देख रही है.

बात कांग्रेस शासित राज्यों कि की जाए तो पंजाब में कैप्टन अमरिंदर सिंह मुख्यमंत्री हैं जो सेना में रह चुके हैं और एक सिपाही गांधीवाद का उपासक तो हो सकता है, लेकिन कभी भी उसका अनुयायी नहीं हो सकता. हालिया बनी सरकारों की बात करें तो छत्तीसगढ़ में जरूर भूपेश बघेल की छवि एवं कौशल गांधीवाद के करीब है, लेकिन उनके साथ खड़े कांग्रेसियों में कितना गांधी हैं यह तो वही बेहतर समझते हैं या छत्तीसगढ़ के निवासी.

मध्यप्रदेश में कमलनाथ स्वयं की स्थिति एवं कुर्सी मजबूत करने में ही व्यस्त नजर आते हैं, ऐसे में उनके लिए भी गांधी की 150वीं जयंती जनता को भरमाने एवं तमाशा करने का जरिया मात्र है.राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को गांधी भी कहा जाता है, हालांकि अशोक गहलोत वास्तविक गांधीवादी नेता हैं, लेकिन गांधी का पासंग भी होने के लिए उन्हें कई जन्म लेने होंगे. पूरा जीवन राजनीति में गुजारने के बावजूद वह खुद को ही असुरक्षित महसूस करते हैं और अपनी स्थिति मजबूत करने में ही सारा समय गुजार देते हैं.ऐसे में गांधीवाद का प्रचार एवं प्रसार संभव नहीं है.

गांधी की विरासत: कितनी किसकी

विवेकानंद, सुकरात, महात्मा गांधी, पंडित नेहरू, नेल्सन मंडेला, अब्राहम लिंकन जैसी शख़्सियत किसी एक व्यक्ति, समुदाय, विचारधारा या देश के नहीं पूरी दुनिया के होते हैं, बिल्कुल उसी तरह जैसे हिटलर, मुसोलिनी, चंगेज खान, ओसामा बिन लादेन पूरी दुनिया एवं मानवता के दुश्मन होते हैं. दोनों ही तरह के शख्सियतों पर उनके अपने परिवार एवं वंशजों का कभी अधिपत्य नहीं रहता, परंतु बात 2019 के भारत के संदर्भ में है और भारत में जायदाद के साथ मां बाप और भगवान भी बंट जाते हैं, महापुरुष भी अपवाद नहीं हैं.

भारत के गृहमंत्री अमित शाह ने गांधी जी की 150वीं जयंती के अवसर पर गांधी संकल्प यात्रा की शुरुआत की है और एक तरह से भाजपा का गांधी की विरासत पर दावा ठोका है. यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है की भाजपा अपने जन्म से ही गांधी के हत्यारे नाथूराम गोड्से की उपासक एवं समर्थक रही है. गांधीजी के शहादत दिवस 30 जनवरी 2019 को भी तमाम भाजपाई नेताओं समर्थकों एवं सहयोगी संगठनों ने पुनः गांधी की प्रतीकात्मक हत्या करते हुए गोड्से की उपासना की थी. तब भाजपा सरकार एवं तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह खामोशी से तमाशा देख रहे थे. ऐसे में आज गांधी संकल्प यात्रा भाजपा एवं गृहमंत्री अमित शाह का राजनीतिक स्टंट एवं गांधी की विरासत हड़पने की साजिश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं है.

गांधी जी क्योंकि कांग्रेस से जुड़े रहे हैं, अतः स्वाभाविक तौर पर कांग्रेस को ही गांधी का उत्तराधिकारी समझा जाता रहा है, लेकिन हकीकतन ऐसा नहीं है. गांधी की विरासत के वास्तविक उत्तराधिकारी पंडित नेहरु रहे हैं और उनके बाद नेहरू-गांधी परिवार ने यह विरासत बखूबी निभाई है, हालांकि बदलते समय एवं पीढ़ियों में ये गांधीवाद भी परिवर्तित होता गया कुछ राजधर्म की मजबूरी एवं कुछ समय का बदलाव गांधीवाद के स्वरूप को भी बदलता गया, लेकिन मोटे तौर पर निर्विवाद रूप से गांधी की विरासत एवं गांधीवाद के परंपरा को नेहरू-गांधी परिवार ने ही आत्मसात किया एवं बरकरार रखा है.

आज से लगभग 2 वर्ष पूर्व तत्कालीन भाजपाध्यक्ष अमित शाह ने छत्तीसगढ़ के दौरे पर गांधी जयंती के निकट समय में ही गांधी जी को अद्भुत जननेता स्वीकारने की जगह उन्हें चतुर बनिया कहते हुए उलाहना दिया था. उस समय के भाजपाध्यक्ष अपनी पार्टी और अपने नेता नरेंद्र मोदी के लिए 2019 में जीत का मंच तैयार करने के प्रयास में थे और उन्होंने भाजपाई विचारधारा के अनुरूप ही कांग्रेसी एवं उसके नेताओं पर लांछन लगाते हुए गांधी जी को भी लपेटे में लिया था, लेकिन आज जब वह खुद भारत सरकार के गृहमंत्री हैं तब उन्हें भी शिद्दत से एहसास हो रहा है की भारत की रूह में पंडित नेहरू बसे हुए हैं और पंडित नेहरू ऐसा इसलिए कर पाए क्योंकि उन्होंने गांधी की विचारधारा को आत्मसात किया था एवं गांधीवाद पर कायम रहते हुए उन्होंने भारत का नवनिर्माण किया था.

अतः संभवत: अमित शाह गांधीवादी विचारधारा का भ्रम फैलाकर खुद को, अपना नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एवं भाजपा को गांधीवाद का उपासक और गांधी की विरासत का उत्तराधिकारी बताकर भारत के अवचेतन में बसे नेहरू को हटाकर अपने नेता, अपनी पार्टी और खुद को वहां बैठाना चाहते हैं, परंतु गृह मंत्री अमित शाह शायद यह भूल गए की भले ही पंडित नेहरू ने गांधी को आत्मसात किया हो, लेकिन उन्होंने गांधी के सिद्धांतों पर चलते हुए अपने दृष्टिकोण के आधार पर भारत का पुनर्गठन किया था.

भाजपा एवं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में मौलिक सोच एवं व्यापक दृष्टिकोण का सर्वथा अभाव है, ऐसे में यदि आप पंडित नेहरू को भारतीय अवचेतन से निकाल भी दें तो वहां एक ऐसे शून्य का निर्माण होगा, जिसे भरना किसी के भी कूवत से बाहर की बात होगी और यह स्थिति भारत के लिए बहुत ही भयानक एवं विनाशकारी होगी.

अंत में लगभग 1 माह पहले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा संसद में उठाई गई बात यहां भी प्रासंगिक हो जाती है: गांधी हमारे (कांग्रेस के) हैं और सावरकर आपके (भाजपा के) हैं, क्या आपने सावरकर को उठाकर बाहर फेंक दिया? क्या आपने सावरकर को फेंक दिया? क्योंकि यदि फेंक दिया तो बहुत अच्छा किया.

यह भी पढ़े : आरएसएस के प्रचारक राकेश सिन्हा का कहना है कि,आज महात्मा गांधी होते तो वह आरएसएस में होते

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