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रेप पीड़िता को कैसे मिले इंसाफ ! जब खुद सरकार ही गंभीर नहीं, कोर्ट ने भी उठाया था सवाल

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देवेन्द्र शर्मा ‘शास्त्री’, सीकर.
बलात्कार ( rajasthan rape Case ) के मामलों में न्याय में देरी में सरकार भी कम जिम्मेदार नहीं है। न्याय के प्रमुख आधार माने जाने वाले वैज्ञानिक सबूत एफएसएल और डीएनए ( FSL and DNA ) की जांच की स्थिति को देखा जाए तो प्रदेश में महज एक जगह जयपुर में यह जांच होती है। निर्भया कांड ( Nirbhaya Case ) के बाद सरकार ने प्रदेश में पांच स्थानों पर एफएसएल लैब ( FSL Lab ) बनाने की योजना बनाई थी। प्रयोगशाला के उपकरणों के लिए केन्द्र सरकार की योजना में भी छह करोड़ रुपए का बजट स्वीकृत किया गया था। इससे करीब तीन करोड़ रुपए की मशीनें भी खरीद ली गई। लेकिन अन्य स्थानों पर एफएसएल लैब खोलने की योजना आगे नहीं बढ़ सकी है। ऐसे में मामले की जल्द जांच के लिए जांच अधिकारी को एफएसएल के बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं। सीकर के एक मामले में तो एसपी के डीओ लेटर के बाद भी एफएसएल जांच जांच नहीं भेजी गई। ऐसे में न्यायाधीश को बिना एफएसएल और डीएनए जांच के ही फैसला सुनाना पड़ा। न्यायाधीश ने नाराजगी व्यक्त करते हुए विधि विज्ञान प्रयोशाला के अधिकारियों को निर्देशित करने के लिए राज्य सरकार को पत्र लिखा, जिसका फैसले में भी उल्लेख किया गया।
संभाग स्तर पर खोली जानी थी एफएसएल सरकार ने प्रदेश के जोधपुर, बीकानेर, कोटा व भरतपुर में विधि विज्ञान प्रयोशाला खोलने की योजना जनवरी में बनाई गई थी। मार्च में बजट आने के बाद जांच के लिए मशीनें भी खरीद ली, लेकिन इन मशीनों को जयपुर की प्रयोगशाला में ही लगाकर काम बढ़ा दिया। सूत्रों का कहना है कि प्रदेश में डीएनए जांच की व्यवस्था करीब आठ वर्ष पहले शुरू की गई थी। इसके बाद कई वैज्ञानिकों को इसके लिए प्रशिक्षण भी दिलवाया गया, लेकिन एक ही जगह जांच की व्यवस्था होने से उनका भी उपयोग नहीं हो पा रहा है।
सीकर में न्यायालय ने उठाया था सवाल खाटूश्यामजी में चार वर्षीय बच्ची से बलात्कार ( Rape With Four Year Old Girl ) के मामले में न्यायालय ने एफएसएल की जांच व्यवस्था पर सवाल उठाए थे। पोक्सो कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश अनिल कौशिक ने इस मामले में आरोपी को आजीवन करावास की सजा सुनाते हुए फैसले में कहा था कि पुलिस अधीक्षक और विशिष्ठ लोक अभियोजक की ओर से बार-बार निवेदन करने के बाद भी पंाच कार्य दिवस में डीएनए की रिपोर्ट न्यायालय में पेश नहीं की गई। न्यायालय के निर्देशों को भी गंभीरता से नहीं लिया गया।कल्याणकारी राज्य होने के नाते सरकार का यह कर्तव्य है कि वह अपने संबंधित विभाग के अधिकारियों को निर्देशित करे कि निरीह मासूम अबोध बालक व बालिकाओं के साथ घटित इस तरह के घृणित अपराधों में विधि विज्ञान प्रयोगशाला के संबंधित अधिकारी अधिक गंभीरता दर्शित करें एवं अविलंब एफएसएल एवं डीएनए रिपोर्ट न्यायालय में पेश किया जाना सुनिश्चित करें।
जांच और न्यायिक प्रक्रिया होती प्रभावित पोक्सो कानून में गंभीर मामलों में मृत्युदंड की सजा का प्रावधान शामिल होने के बाद ऐसे गंभीर मामलों में पुलिस की जांच और न्यायालय में ट्रायल के लिए समय सीमा तय की गई थी। ऐसे में मामलों में पुलिस के जांच अधिकारी को एक माह में जांच पूरी कर चालान पेश करना तय है। वहीं न्यायालय में तीन माह में ट्रायल पूरी करनी होती है। लेकिन एफएसएल और डीएनए जांच समय पर नहीं मिलने के कारण दोनों ही प्रक्रियाओं में विलंब हो रहा है। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि ऐसे मामलों में जल्द जांच के लिए पुलिस अधीक्षक की ओर से पत्र लिखने के बाद भी समय पर जांच नहीं मिल पाती। अलवर के थानागाजी के चर्चित मामले में पुलिस महानिरीक्षक ने लगातार फालोअप कर जांच रिपोर्ट मंगवाई थी।
एफएसएल व डीएनए जांच की व्यवस्था वर्तमान में जयपुर में ही है। जोधपुर व अन्य स्थानों पर इसे शुरू करने के प्रयास जारी है। नियमानुसार पहले प्राप्त नमूनों की जांच पहले की जाती है, लेकिन 12 वर्ष तक के बच्चों के मामले में जांच प्राथमिकता की जाती है। किसी मामले में संबंधित एसपी का पत्र मिलने पर इसे पहले करवाने के प्रयास किए जाते हैं। इस माह के अंत तक प्रयोगशलाा में दो नई मशीन आ जाएगी। इससे जांच के कार्य में तेजी आएगी। -डॉ. हेमंत प्रियदर्शी, अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक आरपीए, जयपुर
एफएसएल एवं डीएनए जांच की व्यवस्था महज जयपुर में होने के कारण उनके पास कार्य की अधिकता रहती है। विशेष मामलों में पुलिस फालोअप कर जल्द मंगवाने का प्रयास करती है। अलवर के मामले में लगातार फोलोअप किया गया। सामान्यत: एक माह में रिपोर्ट नहीं मिल पाती है। -एस.सेंगाथिर, आइजी रेंज, जयपुर

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