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Home News वह हजार मुद्दों पर नाकाम हो जाए लेकिन वह फिर भी जीतेंगे

वह हजार मुद्दों पर नाकाम हो जाए लेकिन वह फिर भी जीतेंगे

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देश में जो मौजूदा वक्त में हालत नजर आ रहे हैं उसको देखकर मन में सवाल उठ रहा है कि क्या यही है गुजरात मॉडल ?

मौजूदा सत्ता के खिलाफ पूरे देश में अलग-अलग जगहों पर छात्रों ने,युवाओं ने,जनता ने विरोध का बिगुल फूंका हुआ है. जनता के बीच सरकार के खिलाफ नाराजगी साफ झलक रही है. सरकार जनता की आवाज को दबाने के लिए पुलिस प्रशासन का इस्तेमाल कर रही है.

पहले जेएनयू के विरोध प्रदर्शन को दबाने की कोशिश की गई,जेएनयू के साथ दूसरे यूनिवर्सिटी के छात्रों पर भी चुप रहने का दबाव बनाया गया. उसके बाद अब एएमयू की बारी है. कहा जा रहा है कि एएमयू के छात्र शांतिपूर्ण तरीके से नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन पुलिस द्वारा उन पर लाठीचार्ज की गई, आंसू गैस के गोले छोड़े गए, मारा गया. पुलिस का भी कहना है कि पुलिस पर प्रदर्शनकारियों द्वारा पथराव किया गया. सच्चाई क्या है वह दोनों पक्ष के लोग ही बेहतर बता सकते हैं.

मसला यहां पर यह नहीं है कि किसने किसको पहले मारा, मसला यहां पर यह है कि अगर सत्ता के खिलाफ विरोध इतने बड़े स्तर पर हो रहा है, सत्ता की नीतियों से देश के बेरोजगार युवा से लेकर किसान तक, महिलाओं से लेकर छात्र तक सामंजस्य नहीं बिठा पा रहे हैं, तो क्या यह समझा जाए कि भाजपा के दिन लग चुके हैं ?

जिस तरीके से पूरे देश में नागरिकता संशोधन बिल के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं पूरा पूर्वोत्तर सड़कों पर उतरा हुआ है. असम त्रिपुरा के लोग इस बिल को वापस लेने की मांग कर रहे हैं. उसके बाद अलग-अलग यूनिवर्सिटी के छात्र सरकार के इस फैसले के खिलाफ विरोध कर रहे हैं, उसको देख कर यही लगना चाहिए कि आने वाले चुनाव में भाजपा को इसका खामियाजा उठाना पड़ सकता है.

लेकिन मैं इस बात से सहमत नहीं हूं. मुझे लगता है भाजपा के खिलाफ विरोध प्रदर्शन जो हो रहे हैं, भाजपा की नीतियों के खिलाफ जो जनता सड़कों पर उतरी हुई है, जो छात्र लाठी-डंडे खा रहे हैं, पुलिस से भिड़ रहे हैं वह, आने वाले चुनाव में भाजपा के खिलाफ वोट बिल्कुल करेंगे, लेकिन भाजपा को उससे नुकसान बिल्कुल नहीं होने वाला इसका कारण भी है.

मौजूदा वक्त में देश के अंदर संप्रदायिक तनाव अपने चरम पर है, नागरिकता संशोधन बिल का मकसद कुछ भी हो, लेकिन उसको सांप्रदायिक बिल बना दिया गया है. उस बिल को धर्म के चश्मे से देखा जाने लगा है और देखा भी इसलिए जा रहा है क्योंकि उसमें एक धर्म विशेष की उपस्थिति नहीं है. इतना सब कुछ होने के बाद भी आने वाले चुनाव में भाजपा पर इसका कोई असर नहीं होने वाला.

क्योंकि जो छात्र विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं सरकार के खिलाफ या फिर जिन राज्यों की जनता सड़कों पर उतरी हुई है या फिर कहा जाए कि पूरे देश में भी अगर विरोध प्रदर्शन हो रहा है सरकार के खिलाफ तो उससे सरकार बिल्कुल भी चिंतित नहीं दिखाई दे रही है, ऐसा सिर्फ इसलिए है क्योंकि जो जनता विरोध कर रही है, जो छात्र विरोध कर रहे हैं वह सरकार के खिलाफ तो विरोध कर रहे हैं लेकिन एकजुट किसके साथ हैं?

लोकतंत्र में कोई चुनाव जीतता है कोई चुनाव हारता है, लेकिन अगर भाजपा के खिलाफ आक्रोश है तो फिर उसका फायदा किस पार्टी को मिलेगा ? मौजूदा वक्त में इस देश की सच्चाई यही है की सरकार का विरोध जनता किसी भी हद तक जाकर कर ले, सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कितने भी बड़े स्तर पर हो जाए, लेकिन अगर सरकार के खिलाफ किसी पार्टी के साथ एकजुट होने की बारी आएगी तो जनता एकजुट नहीं हो पाएगी, बिखर जायेगी अलग अलग पार्टियों और नेतार्ओ में.

छात्रों की बात की जाए, बेरोजगार युवाओं की बात की जाए या फिर पूर्वोत्तर भारत की जो जनता सड़कों पर उतरी हुई है उसकी बात की जाए, यह सभी लोग सरकार की नीतियों से आक्रोशित भले हो, लेकिन भाजपा को सत्ता से बेदखल करने के लिए किसी भी एक पार्टी के झंडे तले आने के लिए यह लोग कभी तैयार नहीं होंगे. अगर बात सिर्फ उत्तर प्रदेश करे तो, उत्तर प्रदेश में कई छोटे-बड़े दल मौजूद हैं. भाजपा के खिलाफ भाजपा से बड़ा वोट बैंक है उत्तर प्रदेश में, लेकिन वह कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कई छोटे दलों में बिखरा हुआ है.

इसके बाद भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने एक अलग राजनीतिक दल बनाने का ऐलान कर दिया है. निश्चित तौर पर इसका फायदा भाजपा को होगा, भाजपा के खिलाफ जरूरत थी एकजुट होने की किसी एक पार्टी के नेतृत्व में, लेकिन यहां भी बिखराव लगातार बढ़ता जा रहा है, भाजपा का जो वोट बैंक है वह मजबूती के साथ भाजपा के साथ खड़ा हुआ है, लेकिन दूसरी पार्टियों का वोट बैंक लगातार बिखर रहा है.

उत्तर प्रदेश की ही हालत ऐसी नहीं है पूरे देश की हालत यही है, भाजपा का विरोध बड़े पैमाने पर जनता कर रही है, भाजपा की नीतियों की आलोचना कर रही है, भाजपा को सत्ता से बेदखल करने की बात कर रही है, लेकिन भाजपा के खिलाफ अगर विकल्प की बारी आती है तो जनता वही बिखर जाती है. जिसका फायदा भाजपा को पहले भी होता रहा है अभी भी होगा और आने वाले वक्त में भी होता रहेगा.

भाजपा लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर रही है लगातार चुनाव जीत रही है उसका सबसे बड़ा कारण उसका एकजुट वोट बैंक का होना तो है ही लेकिन उसके साथ साथ जो जनता भाजपा का विरोध कर रही है भाजपा की जीत का भी कारण वही जनता है विरोध करना समस्या का समाधान नहीं है एकजुट होना समस्या का समाधान है और जनता एकजुट होती हुई दिखाई नहीं दे रही है.

यह भी पढ़े : CAB: असम हिंसा पर प्रधानमंत्री मोदी का अजीबोगरीब बयान

भाजपा के खिलाफ कांग्रेस ने भी मोर्चा खोला हुआ है, कांग्रेस लगातार सड़कों पर उतरी हुई नजर आ रही है, जनता के साथ कंधे से कंधा मिलाती हुई नजर आ रही है, कांग्रेस के अलावा भाजपा का विरोध अखिलेश यादव भी कर रहे हैं, मायावती भी कर रही हैं, ओवैसी भी कर रहे हैं, इसके अलावा कई बड़े निर्दलीय चेहरे भी भाजपा का विरोध कर रहे हैं. जिसमें कन्हैया कुमार जिग्नेश मेवानी जैसे नाम प्रमुख है. इसके अलावा भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर ने भी लंबे समय से भाजपा के खिलाफ मोर्चा खोला हुआ है और अब राजनीतिक पार्टी भी बनाने का ऐलान कर दिया है. भाजपा के पास भी तमाम पार्टियों का गठबंधन है, लेकिन भाजपा के खिलाफ जो पार्टियां हैं वह लगातार भाजपा का विरोध कर रही हैं, जनता के बीच और भाजपा को हराने की अपील कर रही है.

अब जनता इन तमाम पार्टियों और नेताओं को अपना वोट तो देगी, अपनी अपनी पसंद से लेकिन यह पार्टियां एकजुट नहीं है, जनता का एकजुट वोट इन पार्टियों में से किसी एक को नहीं मिलेगा इसका फायदा और नुकसान फिर किसको होगा ? सत्ता का और सत्ता की नीतियों का विरोध पूरे देश में है लेकिन उसका सकारात्मक लाभ हाल फिलहाल मिलता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है भाजपा की विरोधी पार्टियों को और जनता को.

ठीक यही परिस्थितियां 2019 लोकसभा चुनाव के पहले भी बनी थी. बड़े स्तर पर प्रधानमंत्री मोदी का और भाजपा का विरोध पूरे देश में था. प्रधानमंत्री मोदी 2019 के चुनाव प्रचार के आखिरी दौर में यहां तक कहने के लिए मजबूर हो गए थे कि, वह गठबंधन की भी सरकार चला सकते है. मतलब साफ था जिस तरीके का विरोध पूरे देश में भाजपा के खिलाफ था उससे भाजपा का थिंक टैंक भी चिंतित था और प्रधानमंत्री मोदी को भी इस बात का अहसास था कि आसानी से सत्ता नहीं मिलने वाली, लेकिन परिणाम जनता की सोच के बिल्कुल उलट आए, उसका कारण सिर्फ एक ही था जनता के वोट का बिखराव अलग-अलग पार्टियों में.

आगे भी यही सब कुछ देखने को मिलेगा जनता को एक विकल्प ढूंढना होगा. अगर भाजपा को सत्ता से बेदखल करना है तो, लेकिन वह विकल्प जनता हाल-फिलहाल ढूंढती हुई नजर नहीं आ रही है. सड़क से लेकर संसद तक, गांव से लेकर सोशल मीडिया तक भाजपा के खिलाफ माहौल बना हुआ है, लेकिन भाजपा के खिलाफ एक विकल्प कौन होगा उसको चिन्हित अभी नहीं किया है जनता ने, इसलिए सारी मेहनत बर्बाद है जनता की. जनता बिखर जायेगी अलग अलग पार्टियों में और हम दोष EVM को देंगे.

यह भी पढ़े : हाल की घटनाओं से सबक – सिर्फ नेताओं के भरोसे नहीं बचने वाला देश और संविधान

Thought of Nation राष्ट्र के विचार

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