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कांग्रेस हार रही है भाजपा जीत रही है, क्यों? समझिये इसे

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देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को एक के बाद एक झटके लग रहे हैं कभी चुनावी हार के रूप में तो कभी अपने नेताओं को इस दुनिया से खोकर. भाजपा एक के बाद एक चुनावी जीत दर्ज करती जा रही है. सवाल बार-बार मन में यही उठता है कि आखिर कांग्रेस जीत के माहौल में भी क्यों हार जा रही है?
इस जवाब का पड़ताल करते हैं तो पता चलता है कि भाजपा और भाजपा के नेता खास तौर पर प्रधानमंत्री और गृह मंत्री अमित शाह चुनावी जीत के भूखे हैं. मोदी के राज में एक के बाद एक सरकार के नियंत्रण वाली कंपनियां प्राइवेट हाथों में दी जा रही है. सरकार को जिन कंपनियों से लगातार लाभ भी हो रहा है, उन कंपनियों को भी प्राइवेट हाथों में दिया जा रहा है. इसके अलावा रेलवे के प्राइवेटाइजेशन का भी काम शुरू हो चुका है. प्राइवेट हाथों से संचालन का मतलब है कि जनता पर महंगाई की मार.
प्राइवेट सेक्टर देश की गरीब जनता से मनमानी वसूलते हैं. देश के कई एयरपोर्ट आने वाले 50 सालों के लिए अदानी ग्रुप को दे दिए गए हैं. प्रधानमंत्री मोदी 2014 के चुनाव प्रचार के दौरान अक्सर कहा करते थे कि मेरा एक ही सपना है, हवाई चप्पल पहनने वाला भी हवाई जहाज से चले. प्रधानमंत्री मोदी की सरकार को लगभग 7 साल हो चुके हैं. जब ज्यादातर एयरपोर्ट सरकार के नियंत्रण में थे. उस समय तो देश की गरीब जनता जो हवाई चप्पल पहनती है वह हवाई जहाज से सफर नहीं कर पाए तो, क्या अब जब देश के सभी या यूं कहें कि अधिकतर एयरपोर्ट निजी हाथों में जाने वाले हैं या जा चुके हैं, ऐसे वक्त में हवाई चप्पल पहनने वाले मजदूर  या यूं कहें कि, देश की जनता हवाई जहाज से सफर करने का सपना मात्र भी देख सकती है?
कांग्रेस भाजपा
कांग्रेस ने तमाम संस्थाएं बनाई देश की जनता के लाभ के लिए. तमाम एयरपोर्ट बनाएं, देश की अधिकतर संसाधनों पर भारत सरकार का कब्जा हुआ करता था, जिसमें प्राइवेट सेक्टर की दखलअंदाजी बिल्कुल भी नहीं थी. 2014 से पहले इतनी महंगाई भी नहीं थी. लेकिन जो थी उस पर भी भाजपा जनता का माइंड सेट कांग्रेस के खिलाफ कर देती थी. जनता को उस समय वह सुविधाएं महंगी लगती थी. कांग्रेस की सरकार और उस समय के देश के प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भ्रष्टाचारी गिरोह के सरगना लगते थे और उनकी सरकार भ्रष्टाचारी लगती थी. जनता ने मनमोहन सिंह की सरकार को पलट कर गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को देश का प्रधानमंत्री बनाया.
60 पैसे पेट्रोल डीजल का दाम बढ़ जाता था तो भाजपा के नेताओं के साथ साथ अलग-अलग क्षेत्रों की तमाम हस्तियां- अमिताभ बच्चन, अक्षय कुमार, अनुपम खेर, सरीखे अभिनेता भी उस सरकार का विरोध करते थे. इन लोगों को सरकार के खिलाफ बोलने की आजादी थी. 60 पैसे पेट्रोल डीजल के दाम बढ़ जाते थे फिर भी डीजल 40-42 और पेट्रोल 60-62 रुपए के करीब ही रहता था. फिर भी वह जनता को महंगा लगता था. लेकिन आज सब कुछ 85 के पार हो चुका है लेकिन जनता की कोई प्रतिक्रिया नहीं है. अलग-अलग क्षेत्रों से आए हुए हस्तियों की चुप्पी भी लगातार जारी है.
सवाल वही है कि 2014 के पहले की अपेक्षा महंगाई कई गुना अधिक बढ़ चुकी है, जनता की कमर टूट रही है महंगाई के कारण, सुविधाओं के नाम पर जनता के लिए कुछ भी नहीं है. जनता जितना अधिक पैसा खर्च करेगी उसी के हिसाब से सुविधाएं मिलेंगी. लेकिन जनता के पास इस दौर में पैसा नहीं है. जनता की जेब खाली है. दिन रात मेहनत करने के बाद जनता को 2 जून की रोटी नसीब हो रही है और बड़ी मशक्कत के बाद जनता अपना परिवार चला पा रही है. बेरोजगार युवाओं का पहाड़ खड़ा हो रहा है देश में.
जिनके पास रोजगार थे उनमें भी 60% लोग बेरोजगार हो चुके हैं. परिवार चलाने में लगातार असमर्थ जनता इतनी महंगाई के बावजूद, इतनी लूट के बावजूद, आखिर भाजपा को वोट कैसे दे रही है? जनता अपनी आंखों से इस देश की बर्बादी और इस इस देश के संसाधनों को चंद उद्योगपतियों के हाथों में जाते हुए देख रही है. जनता अपनी आंखों से 2014 के पहले के भारत और 2020 के भारत के अंतर को देख रही है और महसूस भी कर रही है. जनता अपनी आंखों से लगातार देख रही है कि प्रधानमंत्री मोदी काम चंद उद्योगपतियों के फायदे को देखते हुए कर रहे हैं. बड़ी-बड़ी कंपनियों और उद्योग घरानों के कर्जा माफ हो रहे हैं.
सरकारी बैंक भी प्राइवेट हाथों के हवाले किए जा रहे हैं. जनता लगातार देख रही है कि प्रधानमंत्री मोदी अपने भाषणों में गरीबों की बात करते हैं, लेकिन भाषण खत्म होते ही, अपने ऑफिस पहुंचते ही उद्योगपतियों के लिए काम करना शुरू कर देते हैं. जनता देख रही है कि प्रधानमंत्री मोदी के पास गरीब जनता को देने के लिए सिर्फ और सिर्फ भाषण है. और पिछले 70 साल की सरकारों की बुराई इसके अलावा गरीब जनता के लिए प्रधानमंत्री मोदी के पास कुछ नहीं है. चुनाव आते है 500-1000Rs.  सरकार की तरफ से दिए जाते हैं और यह भी एक तरह से वोट खरीदने का माध्यम मात्र है. इसके अलावा गरीब जनता के लिए प्रधानमंत्री के पास क्या है?
गरीबों की झुग्गियां हटाई जा रही है, गरीबों पर शोषण जारी है, सरकार उद्योगपतियों के हिसाब से चल रही है, गरीबों को देखकर आंखें बंद कर ले रही है. इन सब के बावजूद कांग्रेस क्यों हार रही है? क्या कांग्रेस के प्रति जनता के मन में प्रधानमंत्री मोदी और उनकी पार्टी द्वारा इतनी नफरत भर दी गई है कि, जनता अपनी तबाही भी नहीं देख पा रही है? कौन सही था कौन गलत है, पहचान भी नहीं कर पा रही है? जनता आज अन्ना हजारे सरीखे नेताओं को भी नहीं ढूंढ रही है. जो कांग्रेस के खिलाफ माहौल बनाने में भाजपा और आरएसएस का साथ दे रहे थे.
आज किसान सड़कों पर है. पुलिस उन पर लाठी डंडे बरसा रही है, आंसू गैस के गोले छोड़े जा रहे हैं, पानी की बौछार की जा रही है, फिर भी मोदी किसानों के साथ हैं? कांग्रेस की सरकारों में कांग्रेस का प्रतिनिधिमंडल आंदोलनकारियों से बात करता था, उनकी समस्याएं सुनता था, उनकी मांगों को सुनता था, उसका समाधान निकलता था. क्या कभी मोदी सरकार में ऐसा हुआ है कि किसी आंदोलनकारी से सरकार का प्रतिनिधिमंडल मिला हो? अन्ना हजारे को दौड़ा के मारा नहीं गया था. फिर भी मोदी जीत रहे हैं कांग्रेस हार रही है.
आवाज दबा दी गई है?
जनता आज रामदेव जैसे व्यापारियों को भी याद नहीं कर रही है, रामदेव जैसे व्यापारियों को भी ढूंढ नहीं रही है, जो कांग्रेस को भ्रष्टाचारी साबित करने में भाजपा की सहायता कर रहे थे. आखिर क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि जनता की ही आवाज दबा दी गई है? जनता चींख तो रही है लेकिन उसकी कोई आवाज नहीं सुन पा रहा है? क्योंकि संस्थाएं भाजपा के कब्जे में है. मीडिया भाजपा के कब्जे में है. मीडिया में वही दिखाया जा रहा है जो भाजपा चाह रही है. जनता की आवाज को जगह नाम मात्र की दी जा रही है. जहां जनता की आवाज से, देश के किसानों की आवाज से भाजपा को नुकसान दिखाई देता है, वहां मीडिया मुद्दे बदल देती है.
कांग्रेस हार नहीं रही है, हराया जा रहा है
इसका मतलब तो यही हुआ कि कांग्रेस हार नहीं रही है, कांग्रेस का साथ देने वालों की आवाज दबाकर कांग्रेस को हराया जा रहा है, संस्थाओं की मदद लेकर, मीडिया की मदद लेकर, प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार द्वारा. क्योंकि जिस निर्भया कांड के कारण दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार बदल गई. और केंद्र में अन्ना हजारे के आंदोलन और निर्भया कांड के बदले मनमोहन सिंह की सरकार है चली गई, ऐसे अन्ना हजारे आंदोलन का आधार भ्रष्टाचार 2014 के बाद बहुत हुआ है, देश के अंदर महिलाओं के खिलाफ अपराध भी 2014 के पहले के मुकाबले 2014 के बाद बहुत हुआ है, लेकिन जिन मुद्दों पर 2014 में सरकार बदल गई, वही मुद्दे उससे कई गुना अधिक तेजी से 2014 के बाद हुए हैं, फिर भी सरकार पर कोई फर्क क्यों नहीं?
आज अगर देश का कोई वर्ग सरकार की नीतियों से परेशान होकर, सरकार के खिलाफ आंदोलन करता है, तो मोदी सरकार मीडिया के साथ मिलकर आंदोलन के पीछे पाकिस्तान, खालिस्तान, आतंकवाद जैसे कनेक्शन निकाल देती है. ताकि प्रदर्शनकारियों को बदनाम किया जा सके, भले ही वह चाहे किसानों का ही प्रदर्शन क्यों ना हो. और भी जो प्रदर्शन किसान कर रहे हैं सड़कों पर उतर कर उस पर कुछ मीडिया चैनलों का कहना है कि खालिस्तन समर्थकों की साजिश है. किसान आंदोलन और इसी के पीछे किसानों की आवाज दबा रही है यह सरकार.
यकीन मानिए आजाद भारत में पहली बार आप एक गैर जिम्मेदाराना सरकार के शासन में जी रहे हैं. गैर जिम्मेदाराना प्रधानमंत्री की भाषण बाजी को ही शासन समझ रहे हैं, जो निष्पक्ष जनता को और विपक्षी राजनीतिक पार्टियों को बदनाम करने के लिए मीडिया का सहारा लेकर किसी भी स्तर तक गिर जाने के लिए तैयार है. और यही मोदी की जीत का फार्मूला भी है और इसी कारण कांग्रेस हार भी रही है.
मीडिया को पकड़ने की जरूरत है. मीडिया का बहिष्कार करने की जरूरत है. मीडिया का बहिष्कार शुरू हुआ, अगर मीडिया को बेनकाब करना शुरू किया कांग्रेस ने, एक बार नहीं बार-बार लगातार,  तो जनता की आवाज भी सुनाई देने लगेगी, जनता की चीख भी साफ सुनाई देगी. और कॉन्ग्रेस तेजी से उठती हुई भी दिखाई देगी. कांग्रेस को दबाया जा रहा है, जनता को दबाया जा रहा है संस्थाओं और मीडिया के सहारे. और इन्हीं दोनों को लगातार बेनकाब करने की भी जरूरत है. यह बेनकाब हुए तो प्राइवेट हाथों में खेल रही सरकार झूठ के पहाड़ से भरभरा कर गिर जाएगी.
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