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दूनी : मोतीसागर बांध की 65 सालों से नहीं ली सुध, गरड़ के चूने से 1952 में हुआ था निर्माण

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65 साल बाद भी मोतीसागर बांध अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। बांध के आसपास दो प्राचीन धार्मिक स्थल होने के कारण यहां आए दिन श्रद्धालु अच्छी खासी संख्या में आते रहते हैं। जिससे यह जिले में एक पर्यटक स्थल का रूप ले सकता है। दूनी तहसील क्षेत्र के धुंआकला में 1952 में लघु सिंचाई परियोजना के नाम से मोतीसागर बांध का निर्माण करवाया गया था। बांध के निर्माण में कही भी सीमंेट का नामो-निशान है और न ही कोई बाहर से सीमंेट, चूना, बजरी मंगवाया गया। बल्कि बांध के नीचे ही खान खोदकर पत्थरों से गरड का चूना तैयार कर इसका निर्माण करवाया गया था। करीबन 20-25 सालों तक देवली, दूनी तहसील का यह सबसे बडा बांध था। 17 फुट की भराव क्षमता वाले मोतीसागर बांध से भरनी, दाखिया, छान, महुआ, मेहंदवास सहित आसपास की करीबन 10 हजार बीघा जमीन सिंचित होती है। मोतीसागर बांध में किसान 3 फसलें सब्जी, मक्का तैयार करते है। बंाध में तैयार होने वाली सब्जी, खरबूजा, ककडी, तरबूज आज भी पडोसी राज्यों में जाते है।

प्रदेशभर की उच्च गुणवत्ता का मूंग का बीज भी इसी बांध में तैयार होता है। जो प्रदेश के राज सीडस के भंडारण में भेजा जाता है। बीसलपुर को भुला देता है बीसलपुर बांध व गोकणेश्वर महादेव मंदिर के सामने दह में डूबने की घटनाएं आए दिन होती रहती है। जिससे लोग बरसात के दिनों में वहां लुफ्त उठाने में घबराते है। मोतीसागर बांध के बुर्जो के नीचे गरड के चुनों से 65 साल पुरानी खानें बनी हुई है। जिसमें मोतीसागर बांध की चादर चलने के दौरान लोग इसका लुफ्त उठाते है। 13 बुर्जों की बनावट लोगों को करती है आकर्षित, दोनों ओर हैं प्रसिद्ध धार्मिक स्थल दूनी। धुआंकला स्थित मोती सागर बांध का पानी सूख जाने से उसका तला दिखने लगा है। निर्माण में ईंट-सीमेंट व बाहरी पत्थर का नहीं हुआ उपयोग बांध के निर्माण के दौरान आकर्षक 13 बुर्जे बनाए गए। बुजुर्ग लादूलाल जाट, दूर्गालाल, नाथु सैन, दूर्गा लाल शर्मा, पूर्व सरंपंच श्योजी खाती, वजीर खान, पानमल खिंची, बनवारी चैधरी, मोहम्मद युनूस, रामचन्द्र गोस्वामी, असलम रंगरेज, भवानी शंकर सैनी, पूर्व सरपंच गोपाल सैनी, मोहन सैनी आदि ने बताया कि आज भी बांध में एक भी ईंट, सीमेंट व बाहर का पत्थर नहीं लगा हुआ है।

ठेकेदार द्वारा बांध के नीचे ही एक खान खोदकर बैलगाडियों की मदद से गरड का चूना तैयार कर पूरे बांध का निर्माण करवाया गया है। बांध में आज भी सीमेंट का एक भी निशान नहीं है। बंाध की बनावट व 13 बुर्जे अपने आप में लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है। ठेकेदार से अभद्रता का आज भी उठा रहे खामियाजा मोतीसागर बांध का निर्माण 1952 में करवाया गया था। पहले यह बांध घाड के पास बनाया जाना था। ग्रामीणों के विरोध के चलते इसे धुंआकला के पास बना दिया गया। यहां भी ग्रामीणों ने भी अपने कुंए, खेत डुबने के डर से बांध बनाने का विरोध किया था। गांव के बुजूर्ग की मानें तो बांध निर्माण कराने आए ठेकेदार के साथ स्थानीय ग्रामीणों ने अभद्र व्यवहार किया। साथ ही उसे राशन सामग्री तक भी उपलब्ध नहीं कराई। जिसके चलते ठेकेदार ने बाहर से मजदूर बुलाकर पूरी 13 बुर्जियाें का निर्माण स्थानीय खान से खोदे गए पत्थर व गरड के चूने से करवाया। ठेकेदार से अभद्रता का खामियाजा धुंआकला के ग्रामीणों को आज भी भुगतना पड़ रहा है।

ठेकेदार इतना नाराज हुआ कि बांध में नहाने तक के घाट नहीं बनाए। पर्यटन का दर्जा दिलाने में कभी नहीं दिखाई रुचि सरकारें आती गई जाती गई, देवली-उनियारा विधानसभा क्षेत्र से सत्तापक्ष में प्रमुख पदों पर भैंरूसिंह शेखावत की सरकार में गृहमंत्री के पद पर काबिज रहे दिग्जिवय सिंह, केन्द्रीय वित्त राज मंत्री नमोनारायण मीणा, अशोक गहलोत सरकार में विधानसभा उपाध्यक्ष रहे रामनारायण मीणा, चिकित्सा व महिला बाल विकास मंत्री रही डॉ. जकिया, उप मुख्यमंत्री रहे बनवारीलाल बैरवा, वसुधंरा सरकार में दूसरी बांध व कृषि मंत्री रहे मंत्री प्रभुलाल सैनी, रहे प्रदेश की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे स्वंय भी धुंआकला में स्थित विश्व प्रसिद्ध गुरूद्वारे में मत्था टेकने आई थी। पड़ोसी पंचायतों के खेतों की होती है सिंचाई बांध धुंआकला में होने के बावजूद भी धुंआकला की 1 बीघा जमीन भी सिंचित नहीं होती।

पडोस की चार पंचायतें भरनी, छान, दाखिया, मेहदंवास सहित चार पंचायतों के 10 हजार बीघा जमीन सिंचित की जाती है। बांध में हमेशा पानी भरा रहता है। इसका निचला हिस्सा 56 सालों से नहीं सुखता है। निचले नाले से आज भी धुंआकला, गैरोली, भरना, के किसान खेती करते हैं। दो धार्मिक स्थलों से जुड़ा है धुंआकला में सिख समुदाय का विश्व प्रसिद्ध गुरूद्वारा है। जहा देशभर से सिख समुदाय के अलावा प्रदेशभर से श्रद्धालु यहा माथा टेकने आते है। साथ ही मोतीसागर बांध से महज 200 मीटर की दूरी पर करीबन 1500 साल पुराना प्राचीन गंगेश्वर शिव मंदिर है।

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